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सपा में शामिल होने की इच्छा

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पिछले कई दिनों से वाली IAS बी.चंद्रकला ( IAS B. Chandrakala Poem ) पिछले काफी दिनों से चर्चा में है| चंद्रकला अपनी काम करने की शैली को लेकर हमेशा से सुर्खियों में रही है। सोशल मीडिया पर भी उनके लाखों चाहने वाले है। उसकी छवि एक ईमानदार और सख्त प्रशासनिक अधिकारी की रही है, लेकिन उन पर लगे ताज़ा आरोपों से उनकी छवि धूमिल हुई है|

वे इन दिनों सोशल मीडिया पर खनन घोटाले को लेकर चर्चा में हैं। अवैध खनन मामले में सीबीआई जांच में फंसी चंद्रकला ने पहली बार CBI छापेमारी पर चुप्पी तोड़ी है। सोशल मीडिया पर हमेशा सक्रिय रहने वाली IAS चंद्रकला ने अपने linkedin अकाउंट पर एक कविता पोस्ट की है, जिसमें अंत में उन्होंने सीबीआई की छापेमारी को चुनावी छापा बताया। उन्होंने लिखा, ‘जीवन के रंग को क्यों फीका किया जाए।’

इस पूरी कार्रवाई के बाद चंद्रकला ने लिंक्डइन अकाउंट पर एक कविता पोस्ट की है। यूं तो यह कविता एक प्रेमिका के शब्द लगते हैं परंतु यदि इसके मायने निकाले जाएं तो यह अखिलेश यादव की तरफ की गई अपील हो सकती है। क्या इस तरह इशारा करके चंद्रकला ने सपा में शामिल होने की इच्छा जताई है।

पढ़िए यह कविता जो चंद्रकला ने सार्वजनिक की है ( IAS B. Chandrakala Poem )

रे रंगरेज़ !  तू रंग  दे मुझको ।।

रे रंगरेज़ तू रंग दे मुझको,

फलक से रंग, या मुझे  रंग दे जमीं  से,

रे रंगरेज़! तू रंग दे कहीं से ।।

छन-छन  करती पायल से,

जो फूटी हैं  यौवन के स्वर;

लाल से रंग मेरी होंठ की कलियाँ,

नयनों को रंग, जैसे चमके बिजुरिया,

गाल पे हो, ज्यों  चाँदनी  बिखरी,

माथे पर फैली  ऊषा-किरण,

रे रंगरेज़ तू रंग दे मुझको,

यहाँ  से रंग, या मुझे रंग दे,  वहीं से,

रे रंगरेज़ तू रंग दे,  कहीं से ।।

कमर को रंग, जैसे, छलकी गगरिया,

उर,,,उठी हो,  जैसे चढ़ती उमिरिया,

अंग-अंग रंग, जैसे, आसमान पर,

घन उमर उठी हो बन, स्वर्ण नगरिया।।

रे रंगरेज़ ! तू रंग दे मुझको,

सांस-सांस  रंग, सांस-सांस  रख,

तुला बनी हो ज्यों , बाँके बिहरिया,

रे रंगरेज़ ! तू रंग दे मुझको।।

पग- रज ज्यों, गोधुली बिखरी हो,

छन-छन करती  नुपूर  बजी हो,

फाग के आग से उठती सरगम,

ज्यों मकरंद सी महक उड़ी हो।।

रे रंगरेज़ तू रंग दे मुझको,

खुदा सा रंग , या मुझे रंग दे  हमीं से,

रे रंगरेज़ तू रंग दे , कहीं से।।

पलक हो,  जैसे  बावड़ी वीणा,

कपोल को चूमे, लट का नगीना,

तपती जमीं  सा मन को रंग दे,

रोम-रोम तेरी चाहूँ  पीना।।

रे रंगरेज़ तू रंग दे मुझको,

बरस-बरस मैं चाहूँ जीना ।।

बी.चंद्रकला, आईएएस

-अंकुर उपाध्याय

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