हुकुमचंद मिल: इंदौर में हक़ के लिए जारी है लड़ाई

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लगभग 26 वर्षों से हुकुमचंद मिल के मजदूर अपने हक़ के लिए संघर्ष कर रहे हैं| इतने वर्षों में भी न्याय नहीं मिलने के बाद मजदूरों ने सरकार के खिलाफ हस्ताक्षर अभियान शुरू कर दिया| वर्ष 1991 में जब मिल बंद हुई थी, तब से गरीबों के रुपए बकाया हैं| एक बार तो न्यायालय ने मजदूरों के हक़ में फैसला सुना भी दिया, लेकिन फिर भी उन्हें उनका बकाया नहीं मिला|

दरअसल, इंदौर में मंगलवार को बारिश में हुकुमचंद मिल के मजदूरों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया| मई 2018 में मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने हुकुमचंद मिल की 42.5 एकड़ जमीन पर मप्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया और इसे नगर-निगम की संपत्ति बना दी| इसके बाद नगर निगम को मजदूरों का बकाया लौटना था, लेकिन इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया|

सरकार की अनदेखी से हुकुमचंद मिल के नाराज़ मजदूरों ने सरकार के खिलाफ मंगलवार से हस्ताक्षर अभियान प्रारंभ किया है| इस अभियान के तहत 5 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर कराकर राज्य सरकार को ज्ञापन दिया जाएगा। वहीं 5000 पोस्टकार्ड प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  को भी भेजे जाएंगे| यह अभियान रीगल तिराहा, मालवा मिल, परदेशीपुरा तथा शहर के विभिन्न क्षेत्रों में चल रहा है|

अभियान में शामिल लोगों का कहना है कि सरकार के सारे दावे झूठे हैं| सरकार जमीनी स्तर पर हुकुमचंद मिल के मजदूरों को कोई सुविधा नहीं मिल रही है| हुकुमचंद मिल के ही हजारों मजदूर अपने हक के पैसों के लिए संघर्ष करते-करते मर गए, लेकिन मप्र सरकार उनके पैसे देने में आनाकानी कर रही है|

गौरतलब है कि 6 अगस्त 2007 को हाईकोर्ट ने मिल मजदूरों के पक्ष में 229 करोड़ रुपए का क्लेम स्वीकृत किया था| उस समय यह तय किया गया था कि जमीन बेचकर मजदूरों को प्रदान किया जाना था, लेकिन मिल की जमीन पर नगर निगम और मप्र सरकार ने अपना-अपना दावा जता दिया| मामला फिर कोर्ट में पहुंचा और कोर्ट ने मप्र सरकार के दावे को खारिज कर दिया|

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