ग्वालियर-चंबल झुलस रहा एट्रोसिटी एक्ट की आग में…

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एट्रोसिटी एक्ट की आग से ग्वालियर-चंबल झुलस गया था, जो चुनावी माहौल में सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है। एट्रोसिटी एक्ट के कारण हुए आंदोलन के बाद से यह अंचल अनुसूचित वर्ग और सामान्य वर्ग की सियासत का अखाड़ा बन गया है। इसी कारण चौथी बार सत्ता बनाने का सपना देख रही भाजपा को ग्वालियर-चंबल में अपनी पकड़ को लेकर चिंता होने लगी है। वहीं कांग्रेस भी इस बार खोई हुई ज़मीन वापस पाने की कवायद में जुटी है।

भाजपा और कांग्रेस के दिग्गज नेता इस अंचल में रैली कर जनता की नब्ज़ टटोलने का प्रयास कर चुके हैं। पिछले पांच वर्षों में ग्वालियर-चंबल के हालात लगातार बदले हैं। इन सब के अलावा जातिगत राजनीति ऐसा मुद्दा है, जिसके सामने सारी समस्याएं पीछे रह जाती हैं। ग्वालियर-चंबल में भड़की एट्रोसिटी एक्ट की आग ने चुनाव में हलचल मचा दी है। वहीं दलों ने भी एक-एक सीट पर जातिगत आधार पर ही टिकट दिए हैं, जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि दल भले ही जातिगत राजनीति न करने के लाख दावे करें, परंतु ज़मीन पर वोट के आगे वे अंधे हो जाते हैं।

ग्वालियर-चंबल में इस बार भी सीधा मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच नज़र आ रहा है, परंतु एट्रोसिटी एक्ट की वजह से कुछ सीटों पर तीसरा मोर्चा भी प्रभाव डाल सकता है। ग्वालियर-चंबल में कांग्रेस की जिम्मेदारी जहां ज्योतिरादित्य सिंधिया के कंधों पर है तो भाजपा की तरफ नरेंद्रसिंह तोमर, यशोधराराजे और नरोत्तम मिश्रा मोर्चा संभाले हुए हैं।

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