एनपीए के लिए यूपीए सरकार जिम्मेदार – पूर्व गवर्नर राजन

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भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने बढ़ते एनपीए के लिए यूपीए सरकार को जिम्मेदार बताया है। संसद की प्राक्कलन समिति को भेजे गए जवाब में उन्होंने कहा कि घोटालों की जांच की वजह से सरकार के निर्णय लेने की गति धीमी होने की वजह से एनपीए बढ़ते गए। राजन ने कहा है कि बैंकों ने जॉम्बी लोन को एनपीए में बदलने से बचाने के लिए ज्यादा लोन दिए। 2006 से पहले बुनियादी क्षेत्र में पैसा लगाना फायदेमंद था। उस वक्त स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और आईडीबीआई बैंकों ने काफी कर्ज दिए। बैंकों का इतना कर्ज देना नुकसानदायक हुआ। लोन देने में सावधानी नहीं बरती गई। वहीं जितने लाभ की अपेक्षा थी, उतना लाभ नहीं मिला।

बैंक एनपीए की समस्या से परेशान

गौरतलब है कि सभी बैंक एनपीए की समस्या से परेशान है। दिसंबर 2017 तक बैंकों का एनपीए 8.99 ट्रिलियन रुपए हो गया था, जो बैंकों में ज़मा कुल राशि का 10.11 फीसदी है। कुल एनपीए में सार्वजनिक क्षेत्रों के बैकों का एनपीए 7.77 ट्रिलियन है। वहीं इससे पहले नीति आयोग के वाइस चेयरमैन राजीव कुमार ने आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन पर गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने कहा कि आर्थिक रफ्तार की धीमी गति के लिए राजन की नीतियां जिम्मेदार थीं, नोटबंदी नहीं।

सुब्रहमण्यम ने की तारीफ

एनपीए संकट पर पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमण्यम जुलाई में समिति के समक्ष पेश हुए थे। उन्होंने एनपीए संकट से निपटने के लिए राजन की तारीफ की थी। उन्होंने समिति को बताया था कि एनपीए की समस्या को पहचाने का श्रेय रघुराम राजन को जाता है। सुब्रहमण्यम के बयान के बाद प्राक्कलन समिति ने रघुराम राजन को पूरा ब्यौरा देने को कहा था।

क्या है एनपीए (NPA) ?

एनपीए का फुलफॉर्म (NON-PERFORMING ASSET) है। जब कोई देनदार यानी बैंक का कर्जदार बैंक की ईएमआई देने में नाकामयाब रहता है, तब उसका लोन अकाउंट एनपीए कहलाता है यानी बैंक का वह कर्ज जो डूबा गया है और जिसके फिर से वापस आने की उम्मीद नहीं के बराबर है, उसे एनपीए कहते हैं।

अक्टूबर 2009 से भारतीय रिजर्व बैंक ने एनपीए के संबंध में पूरक व्यवस्था के रूप में ग्रेडेड प्रोविज़निंग प्रणाली की व्यवस्था शुरू की, जिसके अनुसार एनपीए को तीन भागों में बांटा जाता है।

  1. सब स्टैण्डर्ड संपत्तियां (Sub Standard Assets) – इसके अंतर्गत उन संपत्तियों को रखा जाता है, जो कम से कम पिछले 18 माह तक एनपीए रही हों। इसके अंतर्गत गिरवी रखी गई संपत्तियों का मूल्य उधार दी गई राशि से कम हो जाता है।
  2. संदिग्ध संपत्तियां (Doubtful Assets)- इस वर्ग़ में उन संपत्तियों को रखा जाता है, जो 18 महीने से अधिक एनपीए रही हों। इस ऋण में वे सभी कमजोरियां होती हैं, जो सब स्टैण्डर्ड संपत्तियों में होती हैं।
  3. हानि वाली संपत्तियां (Lossful Assets) – ऐसी संपत्तियां, जिनकी पहचान बैंक के आंतरिक और बाहरी पर्यवेक्षक ने हानि वाली संपत्ति के रूप में गिनी हों।

 एनपीए रोकने के लिए उठाए गए कदम

सरफेसी अधिनियम 2002 – इस अधिनियम का उद्देश्य जानबूझकर ऋणों का भुगतान न करने वालों पर नियंत्रण लगाना है। यह अधिनियम बैंकों को यह अधिकार प्रदान करता है कि भुगतान प्राप्त न होने की स्थिति में गिरवी रखी प्रतिभूति को बैंक जब्त कर ले या उस संपत्ति को असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को बेच दे या इकाई का प्रबंधन अपने हाथों में ले ले।

असेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी – ये ऐसी कंपनियां होती हैं, जो एनपीए को बैंकों से खरीद (एनपीए की कुल राशि से कम दाम पर) लेती हैं और फिर इस एनपीए को उस व्यक्ति से वसूल करने की डील करती है, जिनके नाम पर उधार होता है।

 डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल – इन ट्रिब्यूनल की स्थापना 1993 में की गई थी। यह ट्रिब्यूनल लोगों से ऋण वसूलने का काम करती है, लेकिन यह अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो सका था।

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