एनआरसी मुद्दे पर दिग्विजय का बड़ा बयान

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देशभर में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को लेकर चल रहे विवाद के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह का बड़ा बयान आया है। दिग्विजयसिंह ने कहा कि असम के एनआर (नॉन रजिस्टर) में शत-प्रतिशत मुस्लिम नहीं हैं, उनमें 40 फीसदी हिंदू भी हैं। कुल 40 लाख एनआर में 14 लाख हिंदू हैं।जबलपुर में पत्रकारों से मुखातिब होते हुए दिग्गी ने यह बात कही। उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराजसिंह पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि व्यापमं, अवैध उत्खनन तथा पोषण आहार घोटाले में वे और उनका परिवार लिप्त है। इसके अलावा ई-टेंडर घोटाले में भी भाजपा नेता शामिल हैं।

उन्होंने कहा कि झूठे आरोप लगाने वालों को मैं अदालत लेकर गया। पूर्व सीएम सुंदरलाल पटवा, विक्रम वर्मा व उमा भारती के खिलाफ कोर्ट में गया। सुंदरलाल पटवा ने तो लिखकर दिया था कि दिग्विजय ईमानदार व निष्ठावान व्यक्ति हैं। उमा भारती 15 सालों में अब तक मेरे खिलाफ आरोप साबित नहीं कर पाईं। वहीं सीएम शिवराज ने मुझे देशद्रोही कहा था तो मैं गिरफ्तारी देने थाने पहुंच गया। थाना प्रभारी ने लिखित में दिया कि मेरे खिलाफ कोई शिकायत व साक्ष्य नहीं है।”

दिग्विजय ने आगे कहा कि सीएम एक संवैधानिक पद होता है और ऐसे पद पर बैठे व्यक्ति ने आरोप लगाए। उन्होंने कहा, बिना साक्ष्य के वे ऐसे गंभीर आरोप नहीं लगा सकते इसलिए मैं गिरफ्तारी देने गया था। आईएसआई के लिए जासूसी करने के आरोप में बजरंग दल व भाजपा के जिन नेताओं को गिरफ्तार किया गया था, उनको बचाने का कार्य भाजपा सरकार कर रही है और मुझे देशद्रोही बता रही है।

क्या है एनआरसी ?

एनआरसी वह रजिस्टर है, जिसमें सभी भारतीय नागरिकों का विवरण शामिल है। इसे 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था। रजिस्टर में उस जनगणना के दौरान गणना किए गए सभी व्यक्तियों के विवरण शामिल थे। इसमें केवल उन भारतीयों के नाम शामिल किए जा रहे हैं, जो 25 मार्च 1971 के पहले से असम में रह रहे हैं। एनआरसी उन्हीं राज्यों में लागू होती है, जहां से अन्य देश के नागरिक भारत में प्रवेश करते हैं। एनआरसी रिपोर्ट ही बताती है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं।

एनआरसी की आवश्यकता क्यों पड़ी?

1947 में जब भारत-पाकिस्तान  का बंटवारा हुआ तो कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए, लेकिन उनकी जम़ीन असम में थी और लोगों का दोनों ओर से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी रहा। इस कारण 1951 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया गया था। वर्ष 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी असम में भारी संख्या में शरणार्थियों का आना जारी रहा, जिस कारण राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ (एएएसयू) ने अवैध तरीके से असम में रहने वाले लोगों की पहचान करने तथा उन्हें वापस भेजने के लिए आंदोलन शुरू किया।

असम समझौता

15 अगस्त 1985 को एएएसयू और दूसरे संगठनों तथा भारत सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौतै के अनुसार 25 मार्च 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाले हिंदू-मुसलमानों की पहचान की जानी थी और उन्हें राज्य से बाहर किया जाना था। इस समझौते के तहत 1961 से 1971 के बीच असम आने वाले लोगों को नागरिकता तथा अन्य अधिकार दिए गए, लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। इसके अंतर्गत असम के आर्थिक विकास के लिए विशेष पैकेज भी दिया गया। साथ ही यह फैसला भी किया गया कि असमिया भाषा लोगों को सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किए जाएंगे।

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