रोहिंग्या मुसलमानों पर सीएम त्रिवेंद का विवादित बयान

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रोहिंग्या मुसलमानों और असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) पर विवाद चल रहा है। अब इस मुद्दे पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्रसिंह रावत ने विवादित बयान दिया है। उन्होंने रोहिंग्या मुसलमानों और एनआरसी की अंतिम सूची पर विवाद के बीच रोहिंग्याओं को देश से बाहर करने की बात कही। उन्होंने कहा कि मैं उत्तराखंड की जनता से कहता हूं कि अगर आपको कोई संदिग्ध दिखे तो तुरंत सरकार को बताएं, मैं खुद एक-एक को बाहर कर दूंगा। रावत ने कहा कि किसी भी घुसपैठिए को, चाहे बांग्लादेशी हो या रोहिंग्या, सब को सीमा से बाहर किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि देश में अवैध रूप से रह रहे रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठिये बाहर किए जाएंगे। सभी जिलों में इनकी सूची तैयार की जा रही है। हम जनता से भी सहयोग करने की अपील करते हैं। उन्होंने कहा, सूची के आधार पर इनका परीक्षण होगा और इसके बाद इन्हें प्रदेश से निकाला जाएगा। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्रसिंह रावत ने आगे कहा कि फिलहाल इनके आने पर रोक लगाने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है, लेकिन इन्हें बाहर निकालने की तैयारी शुरू हो चुकी है।

गौरतलब है कि इससे पहले भाजपा महासचिव राम माधव ने कहा था कि असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन की अंतिम सूची में शामिल नहीं किए जाने वाले लोगों का मताधिकार छीन लिया जाएगा और उन्हें वापस उनके देश भेजा जाएगा। वहीं भाजपा नेता और असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने कहा है कि एनआरसी को पूरे भारत में लागू किया जाए।

क्या है एनआरसी ?

एनआरसी वह रजिस्टर है, जिसमें सभी भारतीय नागरिकों का विवरण शामिल है। इसे 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया था। रजिस्टर में उस जनगणना के दौरान गणना किए गए सभी व्यक्तियों के विवरण शामिल थे। इसमें केवल उन भारतीयों के नाम को शामिल किया रहा है जो 25 मार्च, 1971 के पहले से असम में रह रहे हैं। उसके बाद राज्य में पहुंचने वालों को वापस उनके देश भेज दिया जाएगा।  एनआरसी उन्हीं राज्यों में लागू होती है, जहां से अन्य देश के नागरिक भारत में प्रवेश करते हैं। एनआरसी की रिपोर्ट ही बताती है कि कौन भारतीय नागरिक है और कौन नहीं।

क्या पड़ी आवश्यकता ?

1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब कुछ लोग असम से पूर्वी पाकिस्तान चले गए। लेकिन उनकी ज़मीन असम में थी। उन लोगों का दोनों ओर से आना-जाना बंटवारे के बाद भी जारी था, जिसके चलते वर्ष 1951 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार किया गया था। साल 1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी असम में भारी संख्या में शरणार्थियों का आना जारी रहा, जिसके चलते राज्य की आबादी का स्वरूप बदलने लगा। 80 के दशक में अखिल असम छात्र संघ ने अवैध तरीके से असम में रहने वाले लोगों की पहचान करने तथा उन्हें वापस भेजने के लिए एक आंदोलन शुरू किया। 6 साल के संघर्ष के बाद वर्ष 1985 में असम समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।

असम समझौता

15 अगस्त 1985 को अखिल असम छात्र संघ और दूसरे संगठनों और भारत सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसे असम समझौते के नाम से जाना जाता है। इस समझौते के मुताबिक 25 मार्च 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाले हिंदू-मुसलमानों की पहचान की जानी थी और उन्हें राज्य से बाहर किया जाना था। इस समझौते के तहत 1961 से 1971 के बीच असम आने वाले लोगों को नागरिकता तथा अन्य अधिकार दिए गए। लेकिन उन्हें मतदान का अधिकार नहीं दिया गया। इसके अंतर्गत असम के आर्थिक विकास के लिए विशेष पैकेज भी दिया गया। साथ ही फैसला किया गया कि असमिया भाषी लोगों के सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषायी पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानून और प्रशासनिक उपाय किए जाएंगे।

नागरिकता समाप्त होने पर होने वाली समस्याएं

एनआरसी की सूची जारी होने के बाद लोग बेघर हो जाएंगे, मतलब वे किसी भी देश के नागरिक नहीं रहेंगे। ऐसी स्थिति में हिंसा का खतरा हो सकता है। जो लोग दशकों से असम में रहे रहे थे, भारतीय नागरिकता समाप्त होने के बाद वे न तो पहले की तरह वोट दे सकेंगे, न किसी सरकारी योजना का लाभ मिलेगा और अपनी ही संपत्ति पर उनका कोई अधिकार नहीं रहेगा।

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