Atalji death: मैं जीभर जिया, मैं मन से मरूं…

7

आज देश ने राजनीति के एक ऐसे सितारे को खो दिया है, जो सिर्फ अपनी पार्टी के ही चहेते नहीं थे बल्कि अन्य पार्टियों ने नेता भी उन्हें अपना गुरु मानते थे| पूर्व प्रधानमंत्री और भारतरत्न  प्राप्त अटलजी ने दुनिया को अलविदा कह दिया, जिससे देश में राजनीति जगत के साथ ही और आमजन भी आहत हुए हैं| वे एक ऐसी शख्सियत थे, जिनके द्वारा कहा गया एक शब्द भी चर्चा का विषय बन जाता था| वे एक अच्छे राजनीतिज्ञ होने के साथ एक अच्छे कवि भी थे| प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए भी अपने परिवार से सामान्य व्यक्ति की तरह ही मिलते थे|

अटलजी ने अपने जीवन में कई कविताएं लिखी| वे एक राजनेता के तौर पर जितने सराहे गए हैं, उतना ही प्यार उनकी कविताओं को भी मिला है। उनकी कई कविताएं उनके व्यक्तित्व की परिचायक बन गईं| उन्होंने कई ऐसी कविताएं भी लिखीं, जिनसे जीवन जीने का नज़रिया बदल गया| उनके सकारात्मक विचार हमेशा ही लोगों का मन मोह लेते थे| कई साल पहले अस्पताल में भर्ती अटल ने मौत की आंखों में देखकर अपनी कविता से उसे हराया था| आज हम जानते हैं उनकी एक ऐसी कविता, जिसमें उनकी जीत दिखी थी|

मौत से ठन गई…

ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे, इसका वादा न था

रास्ता रोककर वह खड़ी हो गई,
यूं लगा जिंदगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िंदगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जीभर जिया, मैं मन से मरूं,
लौटकर आऊंगा, कूच से क्यों डरूं?

तू दबे पांव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आजमा।

मौत से बेखबर, जिंदगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भंवरों की बांहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ां का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

Share.