यहां धनतेरस पर क्यों होती है यमराज की पूजा

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आज देश भर में धनतेरस (Dhanteras 2019) का पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाया जा रहा है। हर कोई माता लक्ष्मी के आगमन की तैयारों में जुटा है। धनतेरस के दिन माता लक्ष्मी, धन के देवता कुबेर और आरोग्य के देवता धन्वंतरि की पूजा की जाती है। दीवाल आते ही देश का हर बाजार, घर, दुकान, गली-मोहल्ला सभी कुछ जगमगा उठते हैं। हालांकि इस दौरान जहां हर कोई माता लक्ष्मी और धन के देवता कुबेर को प्रसन्न करने की जुगत में लगा रहता है वहीं हमारे देश में एक स्थान ऐसा भी है जहां लोग इस दिन मृत्यु के देवता यमराज की आराधना करते हैं। धनतेरस के दिन यमराज की पूजा-अर्चना करने की यह परंपरा पिछले तकरीबन 292 सालों से चली आ रही है। आज हम आपको उसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं।

दरअसल गुलाबी नगरी के नाम से मशहूर जयपुर में एक चांदपोल द्वार है जहां मृत्यु के देवता यमराज विराजमान है। यह जयपुर का एक मात्रा ऐसा द्वार है जहां यमराज विराजित हैं। इस गेट को ‘यमद्वार’ भी कहा जाता है। इस द्वार को उस वक़्त के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने बनवाया था और दुश्मनों के आक्रमण से बचने हेतु इस द्वार पर यमराज को पहरे पर बैठाया था। इस द्वार की जिम्मेदारी जयसिंह द्वितीय ने रामगोपाल के परिवार को सौंपी थी। तब से रामगोपाल का परिवार इस द्वार पर विराजित भगवान गणेश और यमराज की पूजा कर रहा है। रामगोपाल का कहना है कि सभी द्वारों में से इसी द्वार पर यम को इसलिए विराजित किया गया क्योंकि इस गेट पर सीधे सूर्य की किरणे पड़ती हैं। यमराज को सूर्य का पुत्र कहा जाता है इसलिए इन्हे इस द्वार पर विराजित किया गया है।

रामगोपाल का कहना है कि धनतेरस के दिन यमराज की पूजा की परंपरा वर्षों से निरंतर चली आ रही है। आज भी इस दिन पूर्व राजपरिवार की ओर से यम की पूजा की जाती है। सिर्फ राजपरिवार ही नहीं बल्कि यहां के स्थानीय लोग भी धनतेरस के दिन यहां आकर यमराज की पूरे विधि-विधान से पूजा करते हैं। वहीं इस परकोटे से जो भी शवयात्रा निकलती है वह इसी द्वार से होकर जाती है। इसके अलावा शादी की बारात इस द्वार से निकलने से पहले यमराज को धोक देती है। धनतेरस के पर्व पर यमराज की पूजा का बहुत महत्व है और इस दिन मृत्यु के देवता को दीपदान किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से अकाल मृत्यु से छुटकारा मिलता है।

Prabhat jain

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