“जिस डाल पर बैठे हो, वो टूट भी सकती है..”

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एक मित्र के दफ्तर में 6 लोग काम करते हैं। काम मार्केटिंग का है इसलिए टारगेट रहता ही है। महीने के आखिरी दिनों में सभी कर्मचारियों पर स्वाभाविक तौर पर थोड़ा दबाव होता है। दफ्तर का और निजी टारगेट पूरा न होने पर सबको तनख्वाह कटने का भय रहता है। उन कर्मचारियों में एक लड़की आरक्षित वर्ग की है। अब जब से एट्रोसिटी एक्ट पर घमासान मचना शुरू हुआ है, दफ्तर की हर चर्चा में वह लड़की इस एक्ट का समर्थन करती है जबकि बाकी सभी विरोध में रहते हैं। मेरे मित्र की दिक्कत यह है कि इस लड़की का इस महीने का टारगेट पूरा नहीं हुआ है, लेकिन वह इस फिक्र में है कि तनख्वाह काटने पर यह लड़की उनके खिलाफ कहीं एट्रोसिटी एक्ट में फर्जी मुकदमा न कर दे।

ऐसे कितने ही मामले प्रकाश में आ चुके है, जहां इस कानून की आड़ में फर्जी मुकदमे दर्ज करवाकर उगाही की जा रही है। अभी 2 दिन पहले ही खबर आई थी कि एक महिला के साथ उसके ही दूर के रिश्ते के भाई ने दुष्कर्म किया, लेकिन उसने आरोप राजपूत समाज के 2 युवाओं पर लगाया। लड़की की मंशा राजपूत युवकों से पैसे उगाहने की थी। पुलिस को संदेह हुआ, तब जाकर सच्चाई सामने आ सकी, लेकिन यदि ऐसे हर फर्जी आरोप पर ऐसे ही बेकसूरों की गिरफ्तारियां हों, यह कहां का इंसाफ है? क्या किसी को अपनी बात रखने से पहले गिरफ्तार कर लेना यही 21वीं सदी का भारत है?

भाजपा के भक्त सोशल मीडिया पर अनेक कुतर्कों के सहारे यह सिद्ध करने में लगे हैं कि सवर्ण और पिछड़ों का ‘नोटा’ हिंदुत्व की हार होगी, लेकिन सवाल वही है कि देश, धर्म, हिंदुत्व, पार्टी बचाने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ सवर्ण समाज की ही है? सवाल है की एट्रोसिटी एक्ट पर आंच आती है तो दलित एकमुश्त विरोध दर्ज कराते हैं, तब हिंदुत्व खतरे में नहीं आता? भाजपा राम मंदिर को सुप्रीम कोर्ट में मामले का नाम लेकर टांगती रहे, लेकिन एट्रोसिटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की धज्जियां उड़ा दी, तब हिंदुत्व खतरे में क्यों नहीं आता? कोई बेचारा ब्राह्मण, राजपूत या अन्य पिछड़े वर्ग का बेकसूर उस गलती की सज़ा भुगते जो उसने कभी की ही नहीं, तब हिन्दुत्व खतरे में क्यों नहीं आता?

मामला चाहे आपसी रंजिश का हो चाहे सड़क पर झगड़े का या फिर उधार वसूलने का, ये हर जगह एक वर्ग द्वारा दूसरे को एट्रोसिटी एक्ट में फंसाने की धमकी दी जाती है, उससे भी हिंदुत्व खतरे में क्यों नहीं आता? दफ्तरों में कोई अधिकारी अपने अधीन वर्ग विशेष के कर्मचारी को कुछ बोलने के पहले भी सौ बार सोचता है, तब हिंदुत्व खतरे में क्यों नहीं आता? जो हिंदुत्व 1000 साल की ग़ुलामी के बाद भी आज अक्षुण्ण है, वह हिंदुत्व एक ‘नोटा’ दबाने से खतरे में आ जाएगा, यह बात ही हास्यास्पद है।

कांग्रेस ने देश में सदा ही तुष्टिकरण की राजनीति की, इसमें कोई संदेह नहीं। शायद यही वजह है कि सरकार से क्षुब्ध जनता भी कांग्रेस की तरफ नहीं देख रही है। कांग्रेस के लिए यह परिस्थिति आत्मचिंतन की होनी चाहिए, लेकिन कुछ दिन से चल रहे घटनाक्रम को देखने के बाद देश का सवर्ण और पिछड़ा तबका यह मान चुका है कि उनकी आवाज़ उठाने वाला देश में कोई नेता, कोई पार्टी नहीं है। इन वर्ग का नेताओं ने सिर्फ फर्जी हिंदुत्व की भावना के नाम दोहन ही किया है। निश्चित ही हमें देश भी बचाना है, धर्म भी बचाना है, लेकिन ये सब तब बचेंगे, जब हम खुद बचेंगे।

हिंदुत्व, देश, धर्म की अफीम चटाकर ये सत्तासीन अपना उल्लू सीधा करने की पुरजोर कोशिश करेंगे, लेकिन आपको अब तय करना ही पड़ेगा कि आखिर सबसे पहले बचाना किसको है? सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह राजधर्म का पालन करेगी, लेकिन यहां तो सरकारें वोटबैंक की राजनीति में आकंठ डूबी हुई है। कांग्रेस तो जो है सो है, लेकिन 56 इंच की सरकार भी क्या हमने देश में जातिवाद का जहर घोलने के लिए ही चुनी थी? मेरे मित्र के कार्यालय जैसे हजारों मामले हैं, जहां इंसान अनावश्यक पचड़ों में पड़ने के बजाय खुद नुकसान उठाना बेहतर समझ रहा है। आखिर इस नुकसान का जिम्मेदार कौन है?

21वीं सदी में दुनिया विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में रोज़ नए आयामों को छू रही है, लेकिन हमारे देश में कानून व्यवस्था आज भी 18वीं शताब्दी की तरफ जा रही है। दुनिया में भारत की इज्ज़त का डंका बजवाने का दावा करने वाले बताएं कि क्या विदेशी हंसते नहीं होंगे, ऐसे किसी कानून को सुनकर जहां महज एक शिकायत पर किसी पक्ष को बिना अपनी बात रखने का मौका दिए सीधे सलाखों के पीछे डाल दिया जाए? क्या यही है विकास?

निरंकुश सत्ता और स्वार्थी विपक्ष को देखते हुए जनता को अब ‘नोटा’ का ही सहारा दिखाई दे रहा है। सरकार की समस्या यह है कि उनकी आंखों पर विकास का ऐसा चश्मा चढ़ा है, जिसमें वे आत्ममुग्ध हो चुके हैं। कुछ प्रतिशत वोटों की खातिर दशकों के मजबूत वोटबैंक को दांव पर लगाना बेवकूफी के साथ-साथ धोखाधड़ी भी है। सरकार को बशीर बद्र के शब्दों में जनता यही कहना चाह रही है|

“शोहरत की बुलंदी भी पलभर का तमाशा है, जिस डाल पर बैठे हो वो टूट भी सकती है|”

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