जानिए मुगल रानी जहांआरा के बारे में

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आगरा के ताजमहल के बारे में तो सभी ने सुना ही होगा। ताजमहल का निर्माण शाहजहां ने अपनी बेगम मुमताज की याद में करवाया था। आज ताजमहल की खूबसूरती को देखने लोग दूर-दूर से आते हैं। लेकिन शाहजहां की पहली पुत्री की कब्र के बार में शायद कोई नहीं जानता। इस कब्र पर न तो कोई छत है और न ही कोई दीवार। दीवार के नाम पर सिर्फ पर्दे ही लगे हुए हैं और इस कब्र के ऊपर लिखा है- “‘हरी घास के अलाव मेरी कब्र को किसी भी चीज से ढंका नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इस गरीब व्यक्ति की कब्र को ढकने के लिए सिर्फ घास ही काफी है।”

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यह कब्र है मुगल रानी जहांआरा की। जी हां वही जहांआरा जो शाहजहां की सबसे पहली पुत्री थी। उनकी कब्र को देखकर कोई भी यह नहीं कह सकता कि यह कोई राजसी इंसान की कब्र है। यह कब्र अखिलेश चंद्र दक्षिण से एक कब्र हजरत निजामुद्दीन औलिया दरगाह के पास बनी हुई है। यह पूरी जगह लेट्टिस सार्बल्स से घिरी हुई है। यह मुग़ल रानी मुगल सम्राट शाहजहां और मुमताज महल की सबसे बड़ी थी।

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जहांआरा के बारे में कहा जाता है कि उस वक़्त उनकी मदद के बिना कोई भी चीज़ मुमकिन नहीं थी। जहांआरा बेहद ही सुंदर, धनी और प्रेमी थीं। इसके वाबजूद उन्होंने अपने लिए एक महान मकबरे का निर्माण नहीं करवाया। जहांआरा जो एक मुग़ल रानी थी वे एक सूफी खयालात की थी। सूफी ख्यालों का होने के कारण उन्होंने अपनी कब्र की जगह हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के पास चुन रखी थी। कहा जाता है कि चांदनी चौक का निर्माण उन्हीं ने करवाया था। उनका जन्म 1614 मे हुआ था। जब उनकी मां की मृत्यु हुई तब केवल 17 वर्ष की आयु में ही उन्हें पडशाह बेगम बना दिया गया था।

पडशाह बेगम किसी महिला के लिए सबसे सर्वोच्च पद हुआ करता था। पडशाह बेगम का मतलब था मुग़ल साम्राज्य की पहली महिला। इसके बाद सन 1658 में मुग़ल बादशाह शाहजहां ने अपनी राजधानी आगरा से दिल्ली कर ली थी। जब शाहजहां 1657 में काफी ज्यादा बीमार हो गए तब औरंगजेब ने उन्हें जेल में डाल दिया था। लेकिन मुग़ल रानी जहांआरा ने अपने पिता के साथ ही रहने और उनकी देखभाल करने का फैसला किया। जहांआरा उम्रभर अपने पिता की देखभाल करती रहीं और उन्होंने कभी शादी नहीं की। सन 1681 में 67 वर्ष की आयु में मुग़ल रानी जहांआरा का निधन हो गया।

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