आंखों की रोशनी खोकर भी बने जज

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यदि सपनों को पूरा करने का दृढनिश्चय कर लिया जाए तो मुश्किलें चाहे कितनी भी बड़ी हो, मंजिल की चाह से बड़ी नहीं हो सकती| हर कठिनाई और कमी को मात देकर मंजिल को पाने एक ऐसा ही उदाहरण हैं ब्रह्मानंद शर्मा| ब्रह्मानंद शर्मा राजस्थान में सिविल न्यायाधीश और न्यायिक मजिस्ट्रेट हैं, लेकिन वे अन्य न्यायाधीशों से अलग हैं| वे दलीलों को सुनकर फैसला सुनाते हैं, लेकिन वे खुद अपने नोट्स नहीं पढ़ते| दरअसल 21 वर्ष की उम्र में ब्रह्मानंद शर्मा की आंखों की रोशनी चली गई परन्तु उन्होंने अपने सपने की रोशनी नहीं जाने दी|

आज ब्रह्मानंद शर्मा राजस्थान के पहले नेत्रहीन जज हैं| वे देख नहीं पाते हैं, लेकिन दलीलें सुनकर उचित फैसला सुनाने में सक्षम हैं| शर्मा अजमेर जिले के सारवार कस्बे के न्यायिक मजिस्ट्रेट हैं| 21 साल की उम्र में ही ग्लूकोमा की वजह से उनकी आंखों की रोशनी चली गई थी और वे जज बनना चाहते थे| आंखों की रोशनी जाने के बाद भी उनके सपने बरक़रार रहे और वे जज के लिए नियुक्त हुए|

कोचिंग सेंटरों के मना करने के बाद शर्मा ने बड़े अनोखे तरीके से पढ़ाई की, जिसमें उनकी पत्नी का महत्वपूर्ण योगदान रहा| उनकी पत्नी स्कूल टीचर हैं, जो खुद किताब पढ़तीं और उन्हें रिकॉर्ड करतीं, जिसे सुनकर शर्मा अपनी पढ़ाई करते| भीलवाड़ा के रहने वाले शर्मा ने सरकारी स्कूल में पढ़ाई करने के बाद राजस्थान  ज्यूडिशयल सर्विसेज की परीक्षा दी, जिसमें वे पहली बार में ही सफल रहे| उन्होंने इस परीक्षा में 83वीं रैंक हासिल की थी, जो वाकई चौंका देने वाला था| आज ब्रह्मानंद शर्मा एक सफल जज हैं और बताया जाता है कि शर्मा की सुनने की क्षमता इतनी तेज है कि वे वकीलों के चलने की आवाज से उन्हें पहचान लेते हैं|

अपनी लगन और दृढनिश्चय से जीवन की हर कठिनाई को मात देकर ब्रह्मानंद शर्मा आज हम सब के लिए एक उदाहरण हैं|

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