राज, जिन्होंने प्रशंसकों के दिलों पर किया राज

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हिन्दी सिनेमा  के ‘शोमैन’ कहे जाने वाले दिवंगत अभिनेता-निर्देशक राजकपूर का आज जन्मदिन(Raj Kapoor’s 94th Birth Anniversary) है| अपने अभिनय से फिल्मों में जान फूंक देने वाले राजकपूर ने अपने करियर के दौरान जिन ऊंचाइयों को छुआ, उसके पीछे सिर्फ उनकी मेहनत और काबिलियत थी| उनकी ज़िन्दगी में कई उतार चढ़ाव आए, लेकिन उन्होंने इनका सामना किया और फिल्म जगत में अपनी एक अलग पहचान बनाई|

14 दिसंबर, 1924 को पाकिस्तान के पेशावर में हुआ था| उन्होंने 17 वर्ष की उम्र में एक स्पॉटबॉय के रूप में अपने करियर की शुरुआत की थी| उन्होंने ‘रंजीत मूवीकॉम’ और ‘बॉम्बे टॉकीज़’ फिल्म प्रोडक्शन कंपनी में बतौर स्पॉटबॉय काम किया था| अभिनेता पृथ्वीराज कपूर जैसी हस्ती के घर जन्म लेने के बावजूद राजकपूर को अपने करियर के दौरान काफी संघर्ष करना पड़ा|

जब राजकपूर को पड़ा था ज़ोर का चांटा

निर्देशक केदार शर्मा की फिल्म में राजकपूर ‘क्लैपर बॉय’ के रूप में काम कर रहे थे| इस दौरान राजकपूर ने एक बार इतनी जोर से क्लैप किया कि नायक की नकली दाढ़ी क्लैप में फंसकर बाहर आ गई| इस पर निर्देशक को गुस्सा आ गया और उन्होंने राजकपूर को एक थप्पड़ जड़ दिया| आगे चलकर केदार ने ही अपनी फिल्म ‘नीलकमल’ में राजकपूर को बतौर नायक कास्ट किया|

राजकपूर का पूरा नाम रणबीर राजकपूर था| आज इस नाम से उनके पोते यानी ऋषि-नीतू कपूर के बेटे रणबीर कपूर को जाना जाता है| राज कपूर ने अभिनय का सफर अपने पिता के थियेटर से ही शुरू किया था| वर्ष 1935 में मात्र 10 वर्ष की उम्र में फिल्म ‘इंकलाब’ में उन्होंने छोटा सा रोल किया| इसके 12 साल बाद राजकपूर ने मशहूर अदाकारा मधुबाला के साथ फिल्म ‘नीलकमल’ में लीड रोल किया|

राजकपूर को मिले हैं ये सम्मान

भारत सरकार ने राजकपूर को फिल्म जगत में उनके अमूल्य योगदान के लिए ‘पद्मभूषण’ से सम्मनित किया था|  यह खिताब उन्हें वर्ष 1971 में दिया गया था| वर्ष 1987 में उन्हें सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार भी दिया गया| 1960 में फिल्म ‘अनाड़ी’ और 1962 में ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का फिल्मफेयर पुरस्कार दिया गया| इसके अलावा 1965 में ‘संगम’, 1970 में ‘मेरा नाम जोकर’ और 1983 में ‘प्रेम रोग’ के लिए उन्हें बेस्ट डायरेक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था|

बॉलीवुड के शोमैन राज कपूर को एक अवॉर्ड समारोह में दिल का दौरा पड़ा था| एक महीने तक वे अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलते रहे| 2 जून 1988 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया|

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