निमाड़-मालवा में श्राद्ध पक्ष में क्यों बनाते हैं संजा माता ? जानिए

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निमाड़-मालवा में भाद्रपद माह की शुक्ल पूर्णिमा से पितृमोक्ष अमावस्या तक कुंवारी कन्याओं द्वारा ‘संजा पर्व’ मनाया जाता है| यह पर्व निमाड़-मालवा के साथ-साथ राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में भी मनाया जाता है| पूरे पितृपक्ष के दौरान कुंआरी कन्याएं शाम को एकजुट होकर गोबर के अलग-अलग मांडने मांडती हैं| हर दिन का एक अलग गीत भी गाती हैं| गोबर से दीवार पर बनाई गई कलाकृतियों को  फूल-पत्तियों से सजाया जाता है|

कला का ज्ञान

ऐसा माना जाता है कि संजा पर्व मनाने से कला का ज्ञान बढ़ता है क्योंकि इस पर्व के दौरान पशु-पक्षियों की आकृति बनाई जाती है| सोलह दिनों तक चांद, सूरज, तारे, लड़की, लड़का, सीढ़ी, बैलगाड़ी आदि बनाकर उसे रंगबिरंगी पन्नी और मोटी फूल-पत्ती से सजाया जाता है|

मान्यता

ऐसा माना जाता है कि माता पार्वती प्रतिपदा के दिन पीहर आई थीं| सहेलियों ने उन्हें मनाने तथा मनवांछित फल प्राप्त करने की इच्छा से यह संजा पर्व मनाया था| वे इसके द्वारा हंसी-ठिठौली तथा तानाकशी करती थीं और फिर माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए आरती करती थीं| यही परम्परा आगे चलकर संजा के रूप में प्रचलित हुई| कुंआरी लड़कियां मां पार्वती से मनोवांछित वर की प्राप्ति के लिए पूजन-अर्चन करती हैं, विशेषकर गांवों में संजा ज्यादा मनाई जाती है|

दिनों के अनुसार ऐसा मनता है पर्व

संजा पर्व की शुरुआत भाद्रपद माह की शुक्ल पूर्णिमा से होती है| इसमें सबसे पहले दिन पूनम का पाटला बनाया जाता है| दूज के दिन बिजौरा तो तीज के दिन घेवर बनाया जाता है| ऐसे ही चौथ के दिन चौपड़, पांचवें दिन पांचे, छठे दिन छबड़ी, सातवें दिन सातिया-स्वस्तिक, आठवें दिन आठ पंखूड़ी का फूल, नौवें दिन डोकरा-डोकरी, दसवें दिन वंदनवार, ग्याहरवें दिन केल और बारहवें दिन जलेबी की जोड़ बनाई जाती है| वहीं तेरहवें दिन किलाकोट बनाया जाता है, जिसमें सभी 12 दिन बनाई गई आकृतियां भी होती हैं| इसके बाद अंतिम दिन ढोल-बाजे के साथ सारी कलाकृतियां समेटकर नई नवेली दुल्हन के जैसे संजा को विदाई दी जाती है|

बिदाई के समय गाया जाने वाला गीत 

‘संजा तू थारा घर जा कि  थारी माय मारगी कि कूटगी, चांद गयो गुजरात, हिरनी का बड़ा-बड़ा दांत कि छोरा-छोरी डरपेगा, भई डरपेगा|

इसके साथ ही संजाबाई को छेड़ते हुए लड़कियां यह गीत भी गाती हैं

संजाबाई का लाड़ाजी, लुगड़ो लाया जाड़ाजी

असो कई लाया दारिका, लावता गोट किनारी का|

म्हारा अंगना में मेंदी को झाड़,

दो-दो पत्ती चुनती थी

गाय को खिलाती थी, गाय ने दिया दूध,

दूध की बनाई खीर

खीर खिलाई संजा को, संजा ने दिया भाई,

भाई की हुई सगाई, घर में आई भौजाई,

भौजाई को हुई लड़की, लड़की ने मांडी संजा

संजा सहेली बाजार में खेले, बाजार में रमे

वा किसकी बेटी व खाय-खाजा रोटी वा

पेरे माणक मोती,

ठकराणी चाल चाले, मराठी बोली बोले,

संजा हेड़ो, संजा ना माथे बेड़ो|

संजा को भोग व प्रसाद लगाते समय

नानी-सी गाड़ी लुढ़कती जाए, लुढ़कती जाए, ओ म बठी संजा बईण…

संजा माता जीम ले चूठ ले,  जीमाऊं सारी रात

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