आइए जानते हैं कुंडली के सातवें भाव के बारे में

0

वैदिक ज्योतिष में स्वास्थ्य भाव को दारा कारक की संज्ञा दी गई है | संस्कृत में दारा का तात्पर्य पत्नी अथवा अर्धांगिनी से होता है अतः सातवां भाव मानव जीवन के विवाहित सुख एवं संपन्नता को दर्शाता है|

सातवें भाव में शुभ ग्रहों की दृष्टि मानव के वैवाहिक सुख के लिए अत्यंत आवश्यक है | जब यहाँ गुरु, बुध,  चंद्रमा या शुक्र जैसे शुभ और सौम्य ग्रहों का प्रभाव होता है तब आसानी से कहा जा सकता है कि वैवाहिक जीवन आनंदमय होगा |  शनि का प्रभाव भी सातवें भाव की स्थिरता के लिए अत्यंत जरूरी है अतः जब कभी भी शनि का प्रभाव इस घर पर होता है तो मानव वैवाहिक संबंध को बड़ी प्रगाढ़ता से निभाता है और अक्सर किसी भी विषम परिस्थिति होने पर भी उससे मुंह नहीं मोड़ता | इसी तरह गुरु जैसे शुभ घर भी दांपत्य जीवन में सुखी एवं संपन्नता का द्योतक होने के साथ-साथ मां विवाहित जीवन शुरू होने में थोड़ी देरी भी दर्शाते हैं |

इसके विपरीत अगर चंद्रमा और बुध जैसे तीव्र गति से चलने वाले ग्रहों की दृष्टि अगर सातवें घर पर होती है तो  मानव वैवाहिक डोर में जल्दी से बंधता है अर्थात उसका विवाह जल्दी होता है |

सातवां घर विवाह के अतिरिक्त मनुष्य के जीवन में होने वाली अन्य तरह की भागीदारी को दर्शाता है अतः इस भाव से बिजनेस पार्टनरशिप अर्थात व्यवसाय में भागीदारी को भी देखा जा सकता है | जब कभी दसवे भाव और सातवें भाव दोनों में शुभ ग्रह होते हैं तो मनुष्य पार्टनरशिप में बहुत आगे बढ़ता है |  सातवां भाव मनुष्य के जीवन में प्राप्त होने वाली ऊंची पदवी को भी दर्शाता है यह भाव दिखाता है कि आज कि जातक किसी कंपनी के बड़े डायरेक्टर पद पर नियुक्त हो सकता है |  इसलिए सातवां भाव एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाव बन जाता है क्योंकि यह विवाह जीवन के साथ-साथ मानव के कार्यक्षेत्र और उच्च पदस्थ होने को भी दर्शाता है

साभार – pictureastrology.com

Share.