जानें क्यों करते हैं श्राद्ध, कब है पितृपक्ष श्राद्ध

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श्राद्ध का तात्पर्य होता है अपने पूर्वजों और पितरों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करना। श्राद्ध का सरल अर्थ सत्य को धारण करना है और जीवन का सबसे बड़ा सत्य ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांड है।’ साल में 15 दिन ऐसे होते हैं, जब श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। जिस दौरान श्राद्ध कर्म किए जाते हैं, उसे ही पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष कहते हैं। कहा जाता है कि इस दौरान हमारे पूर्वज और पितर धरती पर वंशजों के पास खिंचे चले आते हैं। ऐसी मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष के 15 दिनों में यमराज पितरों को मुक्त कर देते हैं और समस्त पितर अपने-अपने हिस्से का ग्रास लेने के लिए वंशजों के समीप आते हैं, जिससे उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का तर्पण या श्राद्ध नहीं करने वाले लोगों को पितृदोष का सामना करना पड़ता है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण और श्राद्ध कर्म को महत्वपूर्ण माना गया है। यदि किसी के ऊपर पितृदोष है तो उसे दूर करने के उपाय भी इन्हीं 15 दिनों के दौरान होते हैं। इस बार पितृपक्ष सोमवार 24 सितंबर से शुरू होकर 8 अक्टूबर 2018 तक रहेगा।

श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों का पिंडदान किया जाता है। पिंड एक प्रतीक है, जीवन की शुरुआत का। पिंड का अर्थ शरीर है, जिसमें समग्र ब्रह्मांड की छवि आलोकित है। जैसे नमक जल में विलीन हो जाता है, पर उसका अस्तित्व नष्ट नहीं होता, वैसे ही ब्रह्म शरीर में व्याप्त है, वह दिखाई नहीं देता है।

श्राद्ध पक्ष में जल का अर्घ्य दिया जाता है। जल से ही विश्व जन्म लेता है, उसके द्वारा सिंचित होता है और फिर उसमें लीन हो जाता है। तर्पण में जल में अन्न मिलाकर अर्पित करने का प्रावधान हैक्योंकि शरीर अन्न से अनुप्राणित होता है। भक्ति भाव से पितरों को जब जल और अन्न द्वारा श्राद्ध पक्ष में तर्पण किया जाता है, तब उनकी आत्मा तृप्त होती है। उनका आशीर्वाद परिवार को आगे कल्याण के पथ पर ले जाता है।

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