क्यों कूष्मांडा कहलाईं मां दुर्गा? जानिए कैसे की जाती है पूजा

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आज शारदीय नवरात्रि का चौथा दिन है| इस दिन मां कूष्मांडा की उपासना की जाती है| मां को कर्मयोगी कहा जाता है| इनकी पूजा-अर्चना से सिद्धियों की प्राप्ति होती है, रोग दूर होते हैं|  पुराण में बताया गया है कि प्रलय से लेकर सृष्टि के आरंभ तक चारों ओर अंधकार ही अंधकार था और सृष्टि एकदम शून्य थी| तब आदिशक्ति के कूष्मांडा रूप ने अंडाकार रूप में ब्रह्मांड की रचना की | कूष्मांडा का अर्थ है कुम्हड़ा, उन्हें कुम्हड़े की बलि सबसे ज्यादा प्रिय है इसलिए इन्हें कूष्मांडा देवी कहा जाता है|

मां की अष्टभुजा है, चेहरे पर हल्की मुस्कान और सिर पर बड़ा-सा मुकुट, आठों हाथों में अस्त्र-शस्त्र, कमल का फूल, तीर, धनुष, कमंडल, मटकी, चक्र, गदा और जप माला| शेर पर सवार मां भक्तों को हमेशा संकट से उबारती हैं| उनका तेज सूर्य के समान हैं, वे भक्तों को कर्मयोगी जीवन अपनाकर तेज अर्जित करने की प्रेरणा देती हैं| उन्हें हंसते हुए हर मुश्किल का सामना करना सिखाती हैं|

मां को मालपुए का भोग लगाकर किसी भी दुर्गा मंदिर में ब्राह्मणों को इसका प्रसाद देना चाहिए| ऐसा करने से माता की कृपा स्वरूप उनके भक्तों को ज्ञान की प्राप्ति होती है, बुद्धि और कौशल का विकास होता है|

कूष्मांडा माता की आरती

कूष्मांडा जय जग सुखदानी
मुझ पर दया करो महारानी
पिंगला ज्वालामुखी निराली
शाकम्भरी मां भोली-भाली
लाखों नाम निराले तेरे
भगत कई मतवाले तेरे
भीमा पर्वत पर है डेरा
स्वीकारो प्रणाम ये मेरा
सब की सुनती हो जगदम्बे
सुख पहुंचाती हो मां अम्बे
तेरे दर्शन का मैं प्यासा
पूर्ण कर दो मेरी आशा
मां के मन में ममता भारी
क्यों न सुनेगी अर्ज हमारी
तेरे दर पर किया है डेरा
दूर करो मां संकट मेरा
मेरे कारज पूरे कर दो
मेरे तुम भंडारे भर दो
तेरा दास तुझे ही ध्याये
‘भक्त’ तेरे दर शीश झुकाए

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