पूर्वजों के कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है

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पुरानी कहावत है कि ‘जो बोवोगे, वही पाओगे।’ गीता में भी कहा गया है कि कर्मो का फल जरूर मिलता है। और हर व्यक्ति को इसी जन्म में अपने कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है। गीता में यह भी कहा गया है कि फल की चिंता किए बिना मनुष्य को अपना कर्म करते रहना चाहिए। यह मनुष्य का कर्तव्य है। जो कर्म से अपना मुख मोड़ता है वह पाप का भागिदार है। गीता में दिए गए उपदेश के आधार पर इंसान के वास्तविक जीवन में उसे अपने कर्मों का फल भुगतना पड़ता है। लेकिन कई बार व्यक्ति को उसके स्वभाव के विपरीत कर्मफल मिलते हैं। व्यक्ति को कई बार बेहद बुरी परिस्थिति से गुजरना पड़ता है।

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वहीं कुछ व्यक्तियों को जो हमेशा बुरे कार्य करता हैं उन्हें कभी भी किसी विकट समस्या या फिर भाग्यहीनता का सामना नहीं करना पड़ता। अगर जब इस बात का आकलन किया जाए की गीता में कहा गया है कि मनुष्य को उसके कर्मों का फल मिलता है तो यह बात निराधार साबित होती है। लेकिन इस बात का जवाब जन्मों और सांसारिक जुड़ाव में निहित होता है। कहा जाता है कि बच्चे पूर्वजों का ही अंश होते हैं और उनका दूसरा रूप समझे जाते हैं। हमारे पूर्वजों की जैसी सोच थी या फिर जो स्थिति थी उसके ही अनुसार बच्चों का जीवन भी प्रभावित होता है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य और दुर्भाग्य पारिवारिक कर्मों से ज्यादा जुड़ाव रखता है।

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इसलिए जब भी आपकी परिस्थिति आपके अनुकूल न हो तो आप निराश न हो। न ही अपनी ईमानदारी और कर्तव्य का त्याग करें। बल्कि आपको पूरे विश्वाश के साथ ही अपने कर्तव्य का पालन ईमानदारी के साथ करना चाहिए। जो भी आपके जीवन में हो रहा हो उसे अपने पूर्वजों के कर्म का फल मानकर चलना चाहिए। जबकि आपके द्वारा किए गए अच्छे कर्मों का फल आपको अभी तक नहीं मिला है। इसका तात्पर्य है कि आपके पूर्वजों के कर्मों का फल हमेशा ही नकारात्मक नहीं होता। कई बार यह फल आपके लिए बहुत शुभफलदाई भी होते हैं।

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क्या करें

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यदि आपके साथ अकारण ही बुरा हो रहा है तो आपको इससे जरा भी निराश होने की जरूरत नहीं है बल्कि आपको अपने कर्म करते रहना जरूरी है। जो भी हो रहा है उसका आंकलन करना जरूरी है। आप हमेशा ही अपने दिल की सुने। यदि आपके साथ अकारण अच्छा हो रहा है तो फिर आपको अधिक खुश नहीं होना चाहिए। बल्कि वास्तविकता को पह्चानना चाहिए।

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