जानिए! कैसे हुई तेजादशमी पर्व की शुरुआत

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तेजादशमी का पर्व भारत के अनेक प्रांतों में काफी श्रद्धा, आस्था और विश्वास के साथ मनाया जाता है। भाद्रपद शुक्ल दशमी को तेजादशमी पर्व मनाया जाता है। नवमी की पूरी रात रात्रि जागरण होता है और दूसरे दिन दशमी को जिन स्थानों पर वीर तेजाजी के मंदिर हैं, वहां मेला लगता है। हजारों की संख्या में श्रद्धालु नारियल चढ़ाने एवं बाबा का प्रसाद ग्रहण करने तेजाजी मंदिर जाते हैं। आखिर तेजादशमी पर्व की शुरुआत कैसे हुई? आइए बताते हैं, आपको इसके बारे में|

लोक देवता तेजाजी का जन्म नागौर जिले में खड़नाल गांव में ताहरजी (थिरराज) और रामकुंवरी के घर माघ शुक्ला, चौदस संवत 1130 (29 जनवरी 1074) को जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता गांव के मुखिया थे। वे बचपन से ही वीर, साहसी और अवतारी पुरुष थे। बचपन में ही उनके साहसिक कारनामों की चर्चा होने लगी थी। बड़े होने पर राजकुमार तेजा की शादी सुंदर गौरी से हुई।

एक बार तेजाजी अपने साथी के साथ अपनी बहन पेमल को लेने ससुराल गए थे। बहन पेमन के ससुराल जाने पर वीर तेजा को पता चलता है कि मेणा नामक डाकू ने अपने साथियों के साथ पेमल की ससुराल की सारी गायों को लूट लिया है। वीर तेजा अपने साथी के साथ जंगल में मेणा डाकू से गायों को छुड़ाने के लिए जाते हैं। रास्ते में एक भाषक नामक सर्प घोड़े के सामने आ जाता है।

वीर तेजा उसे रास्ते से हटने के लिए कहते हैं, पर नाग रास्ता नहीं छोड़ता। तब तेजा उसे वचन देते हैं कि, हे भाषक नाग मैं मेणा डाकू से अपनी बहन की गायें छुड़ा लाने के बाद वापस यहीं आऊंगा, तब मुझे डंस लेना। यह तेजा का वचन है।’ तेजा के वचन पर विश्वास कर भाषक नाग रास्ता छोड़ देता है।

जंगल में डाकू मेणा और उसके साथियों के साथ-साथ वीर तेजा ने युद्ध कर उन सभी को मार दिया। उनका पूरा शरीर घायल हो गया था। घायल अवस्था में अपने साथी के साथ गायें बहन पेमल के घर भेजकर वचन में बंधे तेजा भाषक नाग की बांबी की ओर जाते हैं।

घोड़े पर सवार पूरा शरीर घायल अवस्था में होने पर तेजा को आया देख भाषक नाग आश्चर्यचकित रह गया। उसने वीर तेजा से कहा, तुम्हारा पूरा शरीर कटा-पिटा है, मैं तुम्हें कहां डंसूं। तब वीर तेजा ने उसे अपनी जीभ बताकर कहा, ‘हे भाषक नाग मेरी जीभ सुरक्षित है, उस पर डंस लो।’

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