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Kajli Teej 2019 Video : कजली तीज पूजन की विधि और कथा

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हिन्दू धर्म में कई पर्व और त्यौहार मनाए जाते हैं। अभी हाल ही में रक्षाबंधन का त्यौहार बड़ी धूम धाम से मनाया गया। वहीं महिलाओं का सबसे विशेष त्यौहार कजली तीज (Kajli Teej 2019 ) भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। अगर अंग्रेजी कैलेंडर की बात की जाए तो यह त्यौहार जुलाई या अगस्त माह में मनाया जाता है।

जिस तरह हरियाली तीज, हरितालिका तीज मनाई जाती है उसी तरह कजरी तीज भी सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। कजली तीज पर भी महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन कुंवारी कन्याएं भी व्रत रखती हैं और अच्छे वर की मनोकामना करती हैं।

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Kajli Teej 2019 Video :

कजली तीज (Kajli Teej 2019 ) के अवसर पर जौ, गेहूं, चने और चावल के सत्तू में घी और मेवा को मिलाकर पकवान बनाए जाते हैं। इस बार कजली तीज 18 अगस्त यानी रविवार को मनाई जाएगी। इस बार कजली तीज का शुभ मुहूर्त 17 अगस्त की रात से ही शुरू हो रहा है। 17 अगस्त की रात 10 बजकर 48 मिनट पर कजली तीज का शुभ मुहूर्त शुरू हो जाएगा।

यह शुभ मुहूर्त 18 अगस्त को दिन भर रहेगा। कजली तीज के दिन नीमड़ी माता की पूजा अर्चना की जाती हैं। इसके अलावा इस दिन महिलाएं मिट्टी और गोबर की दीवार के सहारे एक तालाब जैसी आकृति बनाती हैं। इसके बाद महिलाओं द्वारा नीम की टहनी को लगाकर दूध और जल चढ़ाया जाता है। बाद में दिया जलाकर रख दिया जाता है।

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कालजी तीज (Kajli Teej 2019 ) के दिन व्रत और पूजन का बेहद विशेष महत्व बताया गया है। चूंकि इस दिन नीमड़ी माता की पूजा की जाती है इसलिए सबसे पहले सुबह सबेरे नीमड़ी माता को जल अर्पित किया जाता है। इसके बाद रोली, कुमकुम और चावल चढ़ाए जाते हैं। इसके बाद नीमड़ी माता के पीछे वाली दीवार पर मेहंदी, रोली और काजल की 13-13 बिंदी अंगुली से लगाई जाती है।

यह बात ध्यान रखें कि मेहंदी और रोली से बिंदी सिर्फ अनामिका अंगुली से ही लगनी चाहिए। जबकि काजल की बिंदी को तर्जनी की अंगुली से लगाना चाहिए। इसके बाद माता को फल चढ़ाएं। इस तरह से पूजा अर्चना करने से शुभ फल प्राप्त होता है।

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गौरतलब है कि कजली माता देवी पार्वती का ही स्वरुप है। यह त्यौहार मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान में मनाया जाता है। इस दिन विशेष पूजा अर्चना के बाद कजली तीज व्रत की कथा भी सुनी और पढ़ी जाती है। इस कथा के बिना इसकी पूजा अधूरी मानी जाती है। आइए जानते हैं इस कथा के बारे में।

कथा

कथा के मुताबिक एक गांव में गरीब ब्राह्मण रहता था। उसकी हालत बेहद दयनीय थी और उसके पास दो समय के भोजन के लिए भी पैसे नहीं थे। एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने कजली तीज का व्रत रखने का संकल्प लिया और अपने पति से व्रत के लिए चने का सत्तू लाने को कहा। सत्तू की मांग की जाने पर ब्राह्मण बेहद परेशान और चिंतित हो गया कि आखिर वह सत्तू कहां से लाएगा?

क्योंकि उसके पास इतने पैसे तो है नहीं। लेकिन फिर भी जैसे-तैसे ब्राह्मण साहुकार की दुकान पर पहुंचा। वहां उसने देखा कि साहुकार तो सो रहा है और ब्राह्मण चुपके से दुकान में दाखिल हो गया और सत्तू लेने लगा। जब ब्राह्मण सत्तू ले रहा था इतने में ही साहूकार की नींद खुल गई। ब्राह्मण को सत्तू लेते हुए साहूकार ने देख लिया और उसे पकड़ लिया। इसके बाद साहूकार ने चोर-चोर का शोर मचाना शुर कर दिया।

ब्राह्मण ने साहूकार से क्षमा याचना कि और कहा कि वह कोई चोर नहीं है। ब्राह्मण ने साहूकार को सब कुछ सच-सच बता दिया कि उसकी पत्नी कजली तीज का व्रत रखना चाहती है और उसी के लिए वह केवल सवा किलो सत्तू ले जा रहा है। ये सत्तू केवल पूजा के लिए ही है।

साहूकार ने ब्राह्मण की तलाशी ली तो उसे कुछ नहीं मिला। साहूकार ब्राह्मण को जानता था और उसे उसकी हालत की भी जानकारी थी। इसलिए साहूकार को जब तलाशी में ब्राह्मण के पास से कुछ भी नहीं मिला तो उसकी आंखे नम हो गई और उसने ब्राह्मण की पत्नी को अपनी बहन मान लिया। इसके बाद साहूकार ने ब्राह्मण को सामान और कुछ पैसे देकर विदा किया। तब से कहा जाता है कि इस व्रत का पालन करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है और सुहागिनों के पति की आयु लंबी होती है।

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