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आइए जानते हैं कुंडली के ग्यारहवें भाव के बारे में

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कुंडली में ग्यारहवें भाव को लाभ भाव की संज्ञा दी गई है | इस भाव से मनुष्य के जीवन में होने वाले हर तरह के लाभ और काम की पूर्ति को देखा जाता है | यह भाव काम त्रिकोण का सर्वोच्च भाव है | इससे मानव जीवन की सारी कामनाओं जैसे कि धन-धान्य, संपत्ति , परिवारिक सुख , वाहन सुख , समाज में मान्यता और इस तरह, हर तरह के भौतिक सुखों की जानकारी मिल सकती है | इतना होने पर भी ग्यारहवें भाव का स्वामी ग्रह कुंडली में क्रूर ग्रह माना गया है | इसका कारण यह माना गया है कि ग्यारहवें भाव का स्वामी मनुष्य को भौतिक संपत्ति तो बहुत प्रदान करता है परंतु वह शारीरिक कष्ट भी देता है |

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परंतु ग्यारहवें भाव में अगर कोई भी ग्रह स्थित होता है तो वह भौतिक जीवन में सुख संपत्ति का साधन बनता है | इस भाव में यूं तो हर ग्रह को अच्छा माना जाता है किंतु शुक्र ग्रह के बारे में कुछ ज्योतिष शास्त्री संदेह रखते हैं | जब भी 11 भाव में शुभ ग्रहों की दृष्टि या प्रभाव होता है तो मनुष्य अच्छे तरीके से और नैतिकता पूर्ण तरीके से जीवन में सफलता प्राप्त करता है | जब ग्यारहवें भाव में क्रूर ग्रहों का प्रभाव ज्यादा होता है तो मनुष्य सा सांसारिक जीवन में साम, दाम , दंड , भेद इत्यादि हर तरह के हथकंडे का उपयोग करके सफल होता है |

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ऐसा कहा जाता है कि जब रावण को पुत्र होने वाला था तब रावण ने सारे ग्रहों को एक साथ पकड़ कर उसकी ग्यारहवें भाव में स्थित कर दिया था | वह पुत्र मेघनाथ था जिसका प्रताप त्रिलोक में प्रसिद्ध था किंतु जब देवताओं को इस बात का पता चला तब सबने जाकर शनिदेव की बहुत आराधना की कि अगर सारे ग्रह मेघनाथ की 11 भाव में हो गए तो वह युद्ध में हमेशा अपराजित हो जाएगा |
इसलिए सभी देवों ने विनय पूर्वक शनिदेव से याचना की ओर उनकी याचना को सुनकर ठीक मेघनाथ के जन्म के समय शनिदेव ने अपना एक पैर 11 भाव से हटाकर 12 घर में रख दिया | ऐसा माना जाता है कि सिर्फ इसी कारण मेघनाथ की मृत्यु हो सकी | इस छोटी सी कहानी से जा रही भाव के अत्यंत गूढ़ रहस्य को आसानी से समझा जा सकता है|

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साभार – pictureastrology.com

 

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