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इंदौर के इतिहास से भी प्राचीन है, श्री इमली साहिब गुरुद्वारा

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श्री इमली साहिब गुरुद्वारा इंदौर आज देश और दुनिया में सिखों की आस्था का प्रतिक हैं| यहाँ सालभर सिख धर्मावलम्बियों के साथ अन्य धर्म के लोग भी दर्शन को आते हैं| इसका इतिहास इंदौर शहर के इतिहास से भी पुराना हैं| संवत् 1506 में सिखों के गुरु नानकदेवजी अपनी उदासीन यात्रा के दौरान इंदौर आये | वास्तविकता में उस दौर में न इंदौर शहर था न यहाँ राज करने वाले होलकर राजाओं का शासन | उज्जैन के बाद ओंकारेश्वर से बेटमा पहुंचे गुरुनानक ने 6 महीने शबद कीर्तन के साथ साधना में लीन रहने के बाद इंदौर आकर कान्ह नदी जिसे आज खान नदी कहा जाता है के किनारे मच्छीबाजार-हरसिद्धी टीले पर समय गुजारा| सिरपुर, बिलावली, पिपल्या तथा पीलियाखाल नदियों से घिरा हराभरा सुरम्य इलाका गुरुनानक को बड़ा पसंद आया | गुरु नानकदेव उस समय तीन माह इंदौर में इन्ही स्थानों पर रहे (Indore Tourism)|

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कहा जाता है कि उस दौर में उन्होंने टीले पर जो इमली का पौधो रोपा था वह विशाल इमली का वृक्ष बना और होलकर रिसायत में पंजाब से आकर बसे सिख परिवारों ने इस टीले पर भव्य गुरुद्वारे का निर्माण करवाया जिसे आज हम जवाहर मार्ग, प्रिंस यशवंत रोड चौराहा पर स्थित श्री इमली साहब गुरुद्वारा के नाम से जानते है |1870 में होलकर फोज के सरदार प्रधानसिंह की अगुआई में पंच प्यारों ने गुरुद्वारा इमली साहेब की नींव रखी| 1940 में श्री गुरुसिंघ सभा इंदौर ने इसका निर्माण भव्य रूप में किया | इसके निर्माण के समय बाधा बने गुरु नानकदेव द्वारा रोपे गए इमली के वृक्ष पर विवाद भी हुआ | इसे काटने न काटने को लेकर दो अलग-अलग विचार धाराएं बनी| अंत में श्री गुरु नानकदेव निराकर को ब्रह्म के उपासक के रूप में देखने वाले सिख समुदाय के लोगों ने शबद ही गुरु है, गुरु ही शबद है के मूल मंत्र पर अमल करते हुए वृक्ष को काट गुरुद्वारे का निर्माण किया|

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गुरुनानकदेवजी और इमली के पौधे के सम्मान में इसे श्री इमली साहिब गुरुद्वारा नाम दिया गया| आज गुरुद्वारे की जो ऊंचाई है उतना ही ऊंचा टीला कभी यहां हुआ करता था| समय के साथ नदियों की बाढ़ के पानी से टीला कट कर समतल जमीन बन गया |इमली साहिब गुरुद्वारा श्री गुनकदेवजी के प्रति सिखों की आस्था और विश्वास का प्रतिक है| गुरु नानकदेव के प्रकाश पर्व सहित अन्य सिख धर्म के त्योहार यहाँ बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं| 450 साल बाद भी यहाँ अद्भुत शांति और शक्ति की अनुभूति मिलती है| इंदौर के निकट श्री बेटमा साहिब गुरुद्वारे में आज भी उस दौरान भ्रमण के समय उपयोग की गई श्री नानकदेवजी की चरण पादुका सहेज कर रखी गई है|

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