इंडस्ट्री में बढ़ा साहित्यिक फिल्मों का चलन

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शरतचंद्र चटोपाध्याय की प्रख्यात पुस्तक ‘देवदास’ हो या विलियम शेक्सपीयर की ‘रोमियो-जूलियट’, फिल्म जगत के शुरूआती दौर से ही निर्माता और निर्देशक हिंदी और अंग्रेजी साहित्य पर फ़िल्में बनाते आ रहे हैं। आगामी कुछ सालों में हमें ऐसी कई फ़िल्में देखने को मिलेंगी, जो किसी ना किसी उपन्यास या कहानी पर आधारित है। बॉलीवुड का फिर से साहित्य की ओर यह कदम एक सकारात्मक पहल है। हालांकि, फिल्मकारों का रुझान हिंदी से ज्यादा अंग्रेजी साहित्य की ओर बढ़ रहा हैं। जबकि, हिंदी साहित्य से हिंदी सिनेमा अभी भी दूर ही है।

 

आज पूरा हिंदी  फिल्म जगत अंग्रेजी साहित्य की ओर बढ़ रहा है, लेकिन ऐसा नहीं है कि हमेशा से ही यहां अंग्रेजी का बोलबाला रहा हो।  बॉलीवुड में भी कई ऐसी हिट फ़िल्में रही हैं, जिनकी कहानी हिंदी  साहित्य पर आधारित थी। दर्शकों ने भी ऐसी फिल्मों को खूब सराहा|

हिंदी सहित्य से दूरी क्यों

किताबों के पन्नों से सिनेमा तक पहुंचने वाली कहानियों में अधिकतम फ़िल्में अंग्रेजी साहित्य की हैं। ऐसे में हिंदी फिल्म निर्माता हिंदी साहित्य से क्यों दूर हैं? इस सवाल पर कुछ निर्देशकों, अभिनेताओं और लेखकों की राय…..

साहित्य और सिनेमा का यह गठबंधन बहुत पुराना है| बीच में इसमें जरूर जंग लग गया था, लेकिन अब फिर से बॉलीवुड अपना पूरा ध्यान हिंदी और अंग्रेजी साहित्य की और रख रहा हैं| यह फिल्म निर्माताओं और साहित्यकारों दोनों के लिए फायदेमंद है।

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