जन्मदिन विशेष: मिर्ज़ा ग़ालिब किताबों, प्रेमियों और फिल्मों के सर्वकालिक महानतम शायर

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आज ‘मिर्ज़ा ग़ालिब ‘ का 222 वां जन्मदिन (Mirza Ghalib 222nd Birth Anniversary) है. उन्हें उर्दू-फ़ारसी का सर्वकालिक महानतम शायर माना जाता है. इस महान शायर का जन्म 27 दिसंबर 1796 में उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में एक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार में हुआ था. जब गालिब महज 5 वर्ष के थे तब एक लड़ाई में उनके पिता शहीद हो गए थे. जिसके बाद उनका पालन पोषण उनके चाचा ने ही किया था, पर शीघ्र ही इनकी भी मृत्यु हो गई थी और ये अपनी ननिहाल में आ गए. गालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असदउल्ला बेग ख़ान ‘ग़ालिब’ था. जब वह 13 वर्ष के थे, इनका निकाह कर दिया गया था.

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गालिब ऐसे शायर थे जो खड़े-खड़े चलते फिरते ग़ज़लें बनाते थे और ऐसे पढ़ते थे कि महफिलों में भूचाल आ जाता था. मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib 222nd Birth Anniversary) करोड़ों दिलों के पसंदीदा शायर हैं. उनकी कई ग़ज़ल और शेर लोगों को याद हैं, जिसमें ‘ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजिए/इक आग का दरिया है और डूबकर जाना है’ जैसे कई शेर शामिल है.

मिर्ज़ा ग़ालिब की पांच बेहतरीन ग़ज़लें

 

15 फरवरी 1869 को दुनिया रुखसत हो गए थे (Mirza Ghalib 222nd Birth Anniversary). उन्होंने फारसी, उर्दू और अरबी भाषा की पढ़ाई की थी. उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग खान अहमद शाह के शासन काल में समरकंद से भारत आए थे. उन्होने दिल्ली, लाहौर व जयपुर में काम किया और अन्ततः आगरा में बस गए. उन्होंने तीन भाषाओं में पढ़ाई की थी, जिसमें फारसी, उर्दू, अरबी आदि शामिल है. ग़ालिब 11 साल की उम्र से ही उर्दू एवं फ़ारसी में गद्य और पद्य लिखने शुरू कर दिए थे. इनको उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है और फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी इनको दिया जाता है. ग़ालिब को भारत और पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में जाना जाता है. उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब मिला है. ग़ालिब (और असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे.

‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ की मशहूर ग़ज़लें जो आज भी लोगों की जुबान पर चढ़ी हुई है-

1-आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

2-बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे (Mirza Ghalib 222nd Birth Anniversary)

3-बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना

आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना

4-दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ

मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ (Mirza Ghalib 222nd Birth Anniversary)

5-हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन

दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है (Mirza Ghalib 222nd Birth Anniversary)

6-हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

नज़्मों के बादशाह ग़ालिब की नई दुनिया

-Mradul tripathi

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