X
Sunday, May 20, 2018

*कर्नाटक: युदियुरप्पा ने दिया इस्तीफा *सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाए येदियुरप्पा *जनता के बीच में जाकर करूंगा काम *येदियुरप्पा ने माना जनता का आभार

डॉक्टरी पेशा: सेवा या लूट? (भाग- 3)

0

705 views

तितली के जन्म की वह कहानी आप सबने सुनी ही होगी, जिसमें एक शिक्षक तितली के दो कोकून लेकर कक्षा में आते हैं। थोड़ी देर बाद एक कोकून में कुछ हलचल शुरू होती है और काफी संघर्ष के बाद एक सुंदर तितली उसमें से बाहर निकलती है। शिक्षक महोदय दूसरे कोकून को विद्यार्थियों को दिखाकर कहते हैं कि मैं थोड़ी देर में आ रहा हूं, तब तक उस कोकून से भी तितली बाहर निकल आएगी। सभी छात्र उसे शांति से देखें और इसमें कोई विघ्न न डालें। कुछ समय बाद कोकून में हलचल होती है और तितली बाहर आने के लिए छटपटाने लगती है। तितली का यह संघर्ष देखकर एक दयालु बच्चे को तितली पर दया आ जाती है और वह कोकून से निकलने में उसकी मदद कर देता है, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से तितली ज्यादा देर जिंदा नहीं रह पाती है।

कहानी का सार यही है कि किसी भी प्राणी के जन्म के समय जो कुदरती संघर्ष उसे करना पड़ता है, उससे उसकी प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और जिजीविषा बढ़ती है। इंसानी बच्चे के जन्म में भी जो संघर्ष शिशु मां की कोख से बाहर निकलने में करता है, उसकी वजह से उसका शरीर मजबूत होता है, जिससे उसे स्वस्थ रहने में मदद मिलती है, लेकिन आज के ज़माने में लालची डॉक्टरों ने बच्चे के जन्म के इस प्राकृतिक तरीके को बाधित करते हुए यहां भी पैसे कमाने का खेल शुरू कर दिया है।

एक नॉर्मल डिलीवरी का खर्च 15 से 30 हजार तक अमूमन आ जाता है वहीं ‘सी सेक्शन’ यानी सिजेरियन डिलीवरी में 50 हजार से लेकर 1 लाख तक का बिल बना दिया जाता है। नॉर्मल डिलीवरी के बाद मां 24 से 48 घंटे बाद ही घर जाने लायक हो जाती है वहीं सिजेरियन में 5 से 7 दिन अस्पताल में ही रुकना पड़ता है। इसके अलावा दवाइयों का खर्च भी बहुत ज्यादा होता है। स्पष्ट है कि अस्पतालों के लिए नॉर्मल डिलीवरी कराना घाटे का सौदा है| इसके लिए वे हर ग्राहक (मरीज उनके लिए ग्राहक ही हैं) को सिजेरियन डिलीवरी ही करवाने की ओर फोकस करते हैं।

इस खर्च के अलावा भी ‘सी सेक्शन’ की वजह से मां और नवजात के शरीर को कई नुकसान उठाने पड़ते हैं। जैसे मां का वजन बढ़ने लगता है, शरीर का आकार बिगड़ जाता है, शिशु की इम्युनिटी कमजोर हो जाती है, स्तनपान में समस्या आती है और कई प्रकार की एलर्जी हो जाती है जबकि नॉर्मल डिलीवरी में ऐसा कुछ नहीं होता है। बच्चे और मां द्वारा जन्म के दौरान एक साथ संघर्ष से भी दोनों के बीच के रिश्ते प्रगाढ़ हो जाते हैं। विभिन्न शोधों से यह स्पष्ट हो चुका है कि मां और शिशु, दोनों के लिए नॉर्मल डिलीवरी ही श्रेष्ठतम विकल्प है।

नॉर्मल डिलीवरी के फायदे और सिजेरियन के नुकसान इतने हैं कि उस पर विस्तार से चर्चा की जा सकती है, लेकिन कुल मिलाकर बात यही है कि मां और बच्चे की सेहत के लिए नॉर्मल डिलीवरी बेहद फायदेमंद है, लेकिन निजी अस्पतालों की व्यावसायिक सेहत पर जरूर इससे बुरा असर पड़ता है। अस्पतालों के बड़े खर्चे उठाने के लिए डॉक्टर अपने ज़मीर का सौदा करने से भी बाज़ नहीं आते हैं और भोले-भाले लोगों को भारी भरकम डॉक्टरी शब्दों में उलझाकर सिजेरियन डिलीवरी करवाने के लिए मजबूर कर देते हैं।

सभी डॉक्टर बुरे नहीं होते यह बात सही है, लेकिन निजी अस्पतालों में जहां 80 से 90% बच्चे सिजेरियन हो रहे हैं जबकि सरकारी अस्पतालों में सिर्फ 30 से 40% तब शक होना लाज़िमी है। डॉक्टरों द्वारा अक्सर यह जवाबी तर्क दिया जाता है कि आजकल लड़कियों की लाइफस्टाइल ऐसी हो गई है कि वे सामान्य तौर से बच्चे को जन्म देने में सक्षम न है। डॉक्टरों की बात गौर करने लायक लगती है, लेकिन तब सवाल उठता है कि अमरीका जैसे देश, जहां लड़कियों की लाइफस्टाइल अपने देश से भी ज्यादा बिगड़ी हुई है, वहां ज्यादातर नॉर्मल डिलीवरी कैसे हो जाती है?

क्रमशः

-सचिन पौराणिक

Share.
30