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चीनः कूटनीति या घुटनेटेकू नीति

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भारत अब चीन के आगे घुटने टेक रहा है या कोई बहुत गहरी कूटनीति कर रहा है, यह समझ पाना मुश्किल है। भारत सरकार ने अपने सभी नेताओं और अफसरों को एक निर्देश भेजा है कि वे दलाई लामा के किसी समारोह में भाग न ले। तिब्बत की प्रवासी सरकार दलाई लामा के भारत-आगमन की षष्टि-पूर्ति मनानेवाली है।

भारत के विदेश सचिव विजय गोखले ने 22 फरवरी को इस आशय का पत्र केबिनेट सचिव पीके सिंह को भेजा और सिन्हा ने उसे सारे मंत्रियों और अफसरों को भेज दिया। गोखले ने यह पत्र अपनी पेइचिंग यात्रा के एक दिन पहले भेजा था।

जाहिर है कि प्रधानमंत्री को बताए बिना यह निर्देश जारी नहीं हुआ होगा। चीन दलाईलामा को धर्मगुरु नहीं मानता। वह उन्हें ‘खतरनाक अलगाववादी’ मानता है। वह उन्हें भेड़ के वेश में भेड़िया कहता है। पिछले साल जब दलाई लामा अरुणाचल प्रदेश गए और उनका स्वागत वहां मुख्यमंत्री पेमा खंडू और केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने किया तो चीनी विदेश मंत्री बौखला गया। उन्होंने अपनी भारत-यात्रा स्थगित कर दी, ब्रह्मपुत्र नदी की बाढ़ पर दी जानेवाली जानकारी बंद कर दी और भूटान के डोकलाम पर कब्जा कर लिया। ब्रिक्स की बैठक में मोदी को बुलाना था, इसलिए चीन ने डोकलाम पर नरमी का नाटक किया। मुठभेड़ खत्म हो गई।

जब गोखले पेइचिंग में थे, उसी समय चीन ने आतंक को वित्तीय समर्थन देने के पाकिस्तानी रवैये का विरेाध करके भारत को खुश कर दिया। अब जून में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेने के लिए मोदी फिर चीन जाने वाले हैं। हो सकता है कि चीन के साथ भारत की कोई सौदेबाजी हुई हो। भारत दलाईलामा का समर्थन न करे तो चीन पाकिस्तान का समर्थन नहीं करेगा, लेकिन यह सौदा भारत को महंगा पड़ सकता है, क्योंकि पाकिस्तान तो चीन का पट्ठा है जबकि चीन आजकल भारत के हर पड़ोसी देश में अपना जाल बिछा रहा है।

भारत ने तिब्बत को चीन का अंग मान लिया है और दलाईलामा ने भी मान लिया है। ऐसे में भारत को चाहिए कि वह चीन को समझाए कि वह दलाईलामा से सीधी बात करे। यदि दलाईलामा से बनाई गई यह दूरी तात्कालिक है और कूटनीतिक पैंतरा है तो कोई बात नहीं है, लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो यह मोदी सरकार का दब्बूपन ही माना जाएगा।

-डॉ.वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं )

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