आज़ाद भारत में पहली फांसी किसे दी गई, और अभी तक कितने लोगों को हुई फांसी

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देश के हर तबके को झकझोर कर रख देने वाले निर्भया गैंगरेप (Nirbhaya Gangrape and Murder) में कल सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने दोषियों की फांसी (First Hanging In Independent India) की सजा बरकरार रखी है चारों दोषियों को 22 जनवरी को फांसी दी जाएगी. मौत की सजा पाने जा रहे इन दोषियों में मुकेश सिंह (Mukesh Singh), पवन गुप्ता (Pawan Gupta), विनय शर्मा (Vinay Sharma) और अक्षय ठाकुर (Akshay Thakur) के अलावा मामले में 2 और दोषी भी थे. इनमें से एक गुनहगार राम सिंह (Ram Singh) ने जेल में ही कथित तौर पर खुदकुशी कर ली थी. इसके अलावा एक और दोषी भी था. वारदात के वक्त नाबालिग होने के कारण उसे जुवेनाइल कोर्ट (Juvenile court) से 3 साल की ही कैद हुई और अब वो आजाद है. यही अकेला दोषी है, जिसका चेहरा और यहां तक कि नाम भी दुनिया नहीं जानती है.

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First Hanging In Independent India | Latest News Updatesआपको बता दें की आजादी के बाद भारत में पहली फांसी (First Hanging In Independent India) नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) को दी गई थी और मेमन से पहले आखिरी बार फांसी की सजा संसद भवन पर हमले के दोषी अफजल गुरु (Afzal Guru) को दी गई थी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 1947 के बाद से देश में अब तक कुल 56 लोगों को फांसी दी गई है और याकूब मेमन भारत में फांसी की सजा पाने वाला 57वां अपराधी था. आपको बता दें की भारत में मौत की सजा कानूनी है लेकिन आम नहीं है. देश में फांसी के फंदे पर लटका कर मौत की सजा दी जाती है. दूसरे देशों में जहरीली सुई, गोली मार कर और बिजली की कुर्सी पर बिठा कर भी मौत की सजा दी जाती है. भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में अपने एक फैसले में कहा था कि सिर्फ दुर्लभों में दुर्लभ (रेयरेस्ट ऑफ रेयर) मामलों में ही फांसी की सजा दी जा सकती है. क्रूरतम हत्या, हत्या के साथ डकैती, बच्चे को खुदकुशी के लिए उकसाने, राष्ट्र के खिलाफ युद्ध भड़काने और सशस्त्र बल के किसी सदस्य द्वारा विद्रोह करने की स्थिति में भारत में फांसी दी जा सकती है. 1989 में इस नियम को बदला गया और इसमें नशीली दवाइयों का कारोबार करने वालों के लिए भी फांसी की सजा तय कर दी गई. हाल के साल में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने वाले व्यक्तियों को भी फांसी की सजा देने का फैसला किया गया है. भारत में हाल के सालों में बलात्कार के बाद हत्या के मामले भी ज्यादा संख्या में सामने आए हैं और तय किया गया है कि ऐसी हत्या के जिम्मेदार लोगों को भी फांसी दी जा सकती है.

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First Hanging In Independent India | Latest News Updatesयाकूब मेमन (Yakub Memon) से पहले भारत में 2004 में पश्चिम बंगाल के धनंजय चटर्जी (Dhananjoy Chatterjee) को 2004 में फांसी (First Hanging In Independent India) पर लटकाया गया था. 25 साल की उम्र में चटर्जी ने 14 साल की हेतल पारेख नाम की किशोरी के साथ बलात्कार (rape) करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी. कोलकाता (Kolkata) की जेल में फांसी के वक्त चटर्जी की उम्र 41 साल थी और उस समय राष्ट्रीय स्तर पर फांसी की सजा को लेकर काफी विवाद हुआ था. भारत में मानवाधिकार संस्थाएं फांसी की सजा के खिलाफ हैं. चटर्जी से पहले 1995 में सीरियल किलर ऑटो शंकर को सेलम में फांसी दी गई थी. गौर करने वाली बात है कि धनंजय (Dhananjoy Chatterjee) की फांसी पर आखिरी मुहर मौत की सजा के विरोधी माने जाते रहे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम (President Dr. APJ Abdul Kalam) ने लगाई थी।

First Hanging In Independent India | Latest News Updates
भारत में निचली अदालतों में फांसी (First Hanging In Independent India) की सजा मिलने के बाद सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है. सुप्रीम कोर्ट भी अगर फांसी की सजा पर मुहर लगा दे तो फिर राष्ट्रपति से दया की अपील की जा सकती है. अगर राष्ट्रपति भी इस अपील को खारिज कर दे तो फांसी दे दी जाती है. इस वक्त भारत की अलग अलग अदालतों ने सैकड़ों लोगों को फांसी सुना रखी है. इनमें से कई याचिकायें राष्ट्रपति या गृह मंत्रालय के पास लंबित हैं. इनमें सबसे प्रमुख 2001 के संसद हमलों के आरोपी अफजल गुरु की याचिका है. अलग अलग अदालतों में फांसी की सजा होने के बाद अफजल गुरु को 20 अक्तूबर 2006 को फांसी दी जानी थी. लेकिन ऐन मौके पर इसे टाल दिया गया. अरुंधति रॉय जैसी कई कार्यकर्ताओं ने मांग की थी कि गुरु की फांसी को माफ कर दिया जाना चाहिए.

First Hanging In Independent India | Latest News Updatesपहले भारतीय जेलों में जल्लादों की खास पोस्ट होती थी क्योंकि उस वक्त फांसी (First Hanging In Independent India) की संख्या भी ज्यादा होती थी. लेकिन हाल के दिनों में भारत में फांसी देने वाले जल्लादों की संख्या बहुत कम हो गई है. पुराने जल्लाद या तो रिटायर हो गए हैं या फिर उनकी मौत हो चुकी है. ऐसे में फांसी की किसी नई सजा को पूरा करने के लिए जल्लाद को खोज निकालना भी बड़ी जहमत का काम है. एमनेस्टी इंटरनेशल के आंकड़ों के मुताबिक भारत में 2007 में 100, 2006 में 40, 2005 में 77, 2002 में 23 और 2001 में 33 लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई लेकिन किसी भी दोषी को फांसी पर लटकाया नहीं गया.

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-Mradul tripathi

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