क्या है बैतूल विधानसभा सीट का रहस्य

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5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के बाद अब सभी की नज़रें 11 दिसंबर को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं। सभी को बेसब्री से इंतज़ार है कि आखिर किस के सिर पर जीत का सेहरा सजेगा। वहीं सभी प्रत्याशियों की सांसें अटकी हैं। ऐसे में कई जिलों को लेकर मिथक भी लोगों के जेहन में छाया है और उन्हीं में से एक है बैतूल जिला। बैतूल जिले का मिथक पिछले 25 सालों से कायम है। कहा जाता है कि बैतूल में जिस प्रत्याशी की जीत होती है, उसी की पार्टी प्रदेश की सत्ता में काबिज होती है। अब ऐसे में लोगों की निगाहें बैतूल की सीट पर जमी हैं।

बैतूल जिले में इस मिथक की शुरुआत 1993 से हुई, जब कांग्रेस प्रत्याशी अशोक साबले को इस सीट से जीत हासिल हुई थी। अशोक बैतूल विधानसभा सीट से विधायक बने साथ ही दिग्विजयसिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। इसके बाद जब 1998 में चुनाव हुए, तब इस सीट से फिर एक बार कांग्रेस की जीत हुई और विनोद डागा विधायक बने| तब प्रदेश में एक बार फिर दिग्विजय को सत्ता हासिल हुई। इसके बाद 2003 में भाजपा को इस सीट से जीतने का मौका मिला और शिवप्रसाद राठौर बैतूल से विधायक बने, तब सूबे में भाजपा की जीत का परचम लहराया। प्रदेश में उमा भारती मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हुईं। इसके बाद से लगातार बैतूल की सीट से भाजपा जीतती आई और प्रदेश में भाजपा की सरकार लगातार जीत दर्ज करती गई।

साल 2008 में बैतूल सीट से भाजपा के अल्केश आर्य विधायक बने तो साल 2013 में हेमंत विजय खंडेलवाल। दोनों ही चुनाव में भाजपा का वर्चस्व कायम रहा और इधर प्रदेश में भी शिवराजसिंह का राज कायम हुआ। लगातार 3 चुनावों में बैतूल सीट पर भाजपा का अधिकार रहा और प्रदेश में भी भाजपा सत्ता में रही। अब इस चुनाव परिणाम को लेकर एक बार फिर सभी की निगाहें बैतूल सीट पर आकर अटक गई है। अब यह तो 11 दिसंबर को ही स्पष्ट होगा कि बैतूल की सीट एक मिथक ही है या फिर कोई इत्तेफ़ाक। जहां अभी तक भाजपा और कांग्रेस में कड़ी टक्कर देखने को मिली है वहीं एक्जिट पोल भी एकमत नहीं दिख रहे हैं, दूसरी ओर बगावत करने वाले नेताओं ने भी चुनावी समीकरण को बिगाड़ दिया है। अब देखना है कि क्या वाकई शिवराज चौथी बार सत्ता हासिल करने में कामयाब रहते हैं या फिर कांग्रेस सत्ता पर काबिज होती है।

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