शिवराज का मप्र की राजनीति से अध्याय खत्म

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शिवराज का इस्तीफा : मध्यप्रदेश में आखिरकार कांग्रेस का वनवास खत्म हो गया। कांग्रेस ने भाजपा के विजय रथ को ध्वस्त कर दिया। इसी के साथ शिवराज का अध्याय समाप्त हो गया। प्रदेश में अब मामा की आवाज़ नहीं गूंजेगी परंतु लोगों के दिलों पर राज करने वाले किसान पुत्र का असर सियासत में लंबे समय तक दिखेगा।

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13 वर्षों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज शिवराज भले ही प्रदेश के सबसे सफल मुख्यमंत्री रहे हो, परंतु उनके राजनीतिक करियर की शुरुआत संघ के मामूली कार्यकर्ता के तौर पर हुई थी। 1975 में छात्र राजनीति से शुरूआत करने वाले शिवराज को 1990 में पहली बार भाजपा के टिकट पर सीहोर की बुधनी विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिला। एक साल बाद पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने अपनी लोकसभा सीट विदिशा से शिवराजसिंह को उत्तराधिकारी बनाया। शिवराजसिंह 2003 में भाजपा युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। वे विदिशा से पांच बार सांसद चुने गए। 29 नवंबर 2005 को उन्होंने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। 13 सालों तक उन्होंने मध्यप्रदेश को संभाला है।

शिवराज की इस हार के बाद यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि वे प्रदेश के बजाय केंद्र की राजनीति में सक्रिय होंगे। यह कहना भी हो सकता है कि वे केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल होकर भाजपा के लिए लोकसभा की राह आसान बनाएं। शिवराज भविष्य में क्या करते हैं, इसका निर्णय उन्हें ही लेना है परंतु यह तय है कि उनकी जगह पार्टी में कम नहीं होगी।

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