भाजपा-कांग्रेस को बस भाषणों में किसान की याद आई ?

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मध्यप्रदेश चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं। चुनाव नज़दीक आते ही पार्टियों के बीच जुबानी जंग तेज़ हो गई है। हर बार चुनाव में राजनीतिक दल नए-नए मुद्दों को लेकर एक-दूसरे को घेरते हैं। हर बार चुनाव में किसानों का मुद्दा काफी अहम रहता है। सत्तापक्ष हो या विपक्ष किसानों का सहारा लेकर अपने आप को मजबूत करने में लगा रहता है, लेकिन किसानों के असल मुद्दों का हल करने की शक्ति दूर तक नज़र नहीं आती।

मध्यप्रदेश में मंदसौर और मुलताई की कहानी किसानों के इस दर्द को साफ जाहिर करती है। मंदसौर से भाजपा के दामन पर दाग लगे तो वहीं मुलताई से कांग्रेस दामन गंदा हुआ। दिग्विजय के काल में मुलताई में पुलिस की गोलियों से 24 किसानों की मृत्यु हो गई थी, जबकि 150 किसान घायल हो गए थे। वहीं वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में मंदसौर में पुलिस की गोलियों से 6 किसानों की मौत हुई, लेकिन जब राजनीतिक संग्राम ज़ोरों पर है, तो यह मुद्दा कहीं गायब सा हो गया है।

मुलताई गोलीकांड और मंदसौर किसान आंदोलन ये दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर पिछले दिनों खूब राजनीति हुई, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं, ये मुद्दे अचानक कहीं गायब हो गए। पहले कांग्रेस ने मंदसौर किसान आंदोलन के मुद्दे पर भाजपा को घेरने की कोशिश की, लेकिन इसका जवाब भाजपा ने मुलताई गोलीकांड का जिक्र किया तो कांग्रेस ने मौन धारण कर लिया। कांग्रेस के चुप्पी के बाद भाजपा के भाषणों से मुलताई छूमंतर हो गया यानी ये गंभीर मुद्दे दोनों पार्टियों की मौन सहमति के कारण गायब हो गए।

क्या है मंदसौर गोलीकांड ?

6 जून 2017 को मंदसौर में अपनी मांगों के लिए आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस ने गोली चला दी। इस गोलीकांड में 6 किसानों की जान चली गई। कांग्रेस ने भाजपा पर किसानों की मौत का आरोप लगाया तो सीएम शिवराज उपवास पर बैठे नज़र आए। इसके बाद कांग्रेस की तरफ से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी 72 घंटों का उपवास किया था।

क्या है मुलताई गोलीकांड ?

12 जनवरी 1998 को 24 किसान पुलिस की गोलियों से मारे गए थे, जबकि 150 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस वीभत्स कांड ने उस वक्त काफी चर्चा बटोरी थी, लेकिन मंदसौर पर कांग्रेस के आक्रामक होते ही भाजपा एक बार फिर इस पुराने मुद्दे को वापस लेकर आई।

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