आज भी कम नहीं हुआ दिग्विजयसिंह का दम

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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं। मध्यप्रदेश की राजनीति की बात की जाए और उसमें पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह का ज़िक्र न हो तो बात अधूरी सी लगती है। दस साल तक मध्यप्रदेश की चुनावी राजनीति से दूर रहे, इसके बाद भी उनका राजनीतिक दबदबा बना हुआ है। आज भी देश की राजनीति में उनका अलग ही रूतबा है। उनके बयानों से मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों में हलचल पैदा हो जाती है।

एक वक्त में दिग्विजयसिंह को उन चुनिंदा नेताओं में गिना जाता था, जो अपनी रणनीति के दम पर राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। यही कारण है कि मप्र की छोटी सी नगरपालिका राघौगढ़ के चेयरमैन के पद से शुरुआत करने के बावजूद वे प्रदेश के मुख्यमंत्री पद तक पहुंचे और दस साल तक पद पर बने भी रहे।

2003 का चुनाव हारने के बाद दिग्विजयसिंह ने दस साल चुनाव नहीं लड़ा, लेकिन प्रदेश और देश की राजनीति को प्रभावित करते रहे। 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले सब यही सोच रहे थे कि दस वर्ष तक चुनावी राजनीति से दूर रहने के बाद दिग्विजयसिंह ने राजनीतिक ताकत खत्म हो गई होगी। तब ऐसे में उन्होंने गैर-राजनीतिक नर्मदा यात्रा के जरिये राजनीति का अपना पुराना रूप फिर से सामने लाकर रख दिया। सक्रिय राजनीति से अपने वनवास के बाद नर्मदा यात्रा के जरिये उन्होंने ऐसी वापसी की कि चुनावी साल में मौन बैठी कांग्रेस अचानक एक्शन मोड में आ गई।

कांग्रेस पार्टी के द्वारा दिग्विजयसिंह से एक निश्चित दूरी बनाने के बावजूद यदि मध्यप्रदेश में कांग्रेस सत्ता में आई तो उसका मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह की मर्जी के बिना नहीं बन सकेगा। वहीं दिग्विजयसिंह के कांग्रेस के बड़े कार्यक्रमों से दूर रहने को उनकी नाराज़गी नहीं बल्कि कांग्रेस की रणनीति भी कहा जा सकती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि दिग्विजयसिंह आज भी राजनीति की एक बड़ी ताकत हैं।

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