कांतिलाल भूरिया के गढ़ में कांग्रेस को करना पड़ा हार का सामना

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मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू हो गई है। यदि मध्यप्रदेश की राजनीति में झाबुआ की बात करें तो यह जिला प्रदेश में कांग्रेस के दिग्गज नेता कांतिलाल भूरिया का गढ़ है। इसके बावजूद कांग्रेस 2013 के विधानसभा चुनाव में यहां से एक भी विधानसभा सीट पर कब्जा नहीं कर पाई थी। जिले की तीन सीटों में से दो सीटों झाबुआ और पेटलावद पर भाजपा का परचम लहरा वहीं थांदला सीट निर्दलीय के हिस्से में गई।

हालांकि आगामी विधानसभा चुनाव के समीकरण 2013 से अलग हो सकते हैं क्योंकि इस जिले में लोगों को सबसे ज्यादा गुस्सा पेटलावद हादसे को लेकर है, जिसमें करीब 90 लोगों की मौत हो गई थी। इसके साथ ही 2013 के चुनाव में मोदी लहर के कारण भाजपा को जो लाभ मिला, उसकी संभावना अब कम है।

जिले की सबसे अहम सीट यानी झाबुआ की बात की जाए तो यहां रिकॉर्ड रहा है कि जो कैंडिडेट एक बार चुनाव जीत गया तो उसे जनता ने दोबारा मौका नहीं दिया। इसके पीछे खास वजह यह है कि पूरे झाबुआ जिले में ही लोग आज भी पीने के पानी जैसी मूलभूत समस्या से परेशान हैं। रोज़गार की कमी भी है। खास बात यह है कि झाबुआ सीट से इस बार कांतिलाल भूरिया के बेटे विक्रांत भूरिया अपना दावा ठोक रहे हैं। यदि विक्रांत यहां से चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस को इसका फायदा न केवल सीट पर बल्कि जिले में भी इसका असर देखने को मिलेगा।

झाबुआ सीट से भाजपा के विधायक शांतिलाल बिलवाल का कहना है कि उन्होंने अच्छा कार्य किया है, वे झाबुआ में दोबारा जीतेंगे, लेकिन जिले के पुराने रिकॉर्ड को देखा जाए तो एक प्रत्याशी दोबारा नहीं जीतता, उसको देखते हुए बिलवाल की जीत संशय के घेरे में है। कांतिलाल भूरिया के गढ़ में ही कांग्रेस का कोई वजूद नहीं है, लेकिन इस बाक कांग्रेस मानकर चल रही है कि सत्ता विरोध लहर में उनका अच्छा होना तय है।

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