छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर नज़र, ये तय करेंगे खेल

0

छत्तीसगढ़ में राजनीतिक सरगर्मी तेज़ होने लगी है| चुनावी साल का माहौल छत्तीसगढ़ में अब पूरी तरह से बनने लगा है| प्रदेश की राजनीति इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है| कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल चुनावी रण में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं| कांग्रेस जहां एक ओर अपने 15 साल के वनवास को ख़त्म करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है वहीं भाजपा भी चौथी बार सरकार बनाने की कवायद में है|

ऐसे में छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव रोमांचक होता नज़र आ रहा है| राज्य में आदिवासी मतदाता विशेष महत्व रखते हैं और यही कारण है कि दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के चुनावी गणित का पूरा तानाबाना अनुसूचित जनजाति (एसटी) के मतदाताओं के इर्दगिर्द  बुना जा रहा है। माना जाता है कि छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी एसटी वर्ग के पास ही है| इसी वजह से दोनों प्रमुख दलों ने दो दर्जन से अधिक सीटों को प्रभावित करने की ताकत रखने वाले अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को फिलहाल नजरअंदाज़ कर रखा है| आइये, बताते हैं आपको कि आखिर क्या है छत्तीसगढ़ में सीटों का गणित|

बस्तर-सरगुजा में खेल

एसटी वर्ग की सर्वाधिक आबादी व आरक्षित सीटें बस्तर व सरगुजा संभाग में है। यही कारण है कि भाजपा के वरिष्ठ नेता इन संभागों में पहुंच रहे हैं| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथसिंह , भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत कई केंद्रीय नेता और मंत्री बस्तर व सरगुजा का दौरा कर चुके हैं|  कांग्रेस के प्रदेश संगठन से जुड़े राष्ट्रीय नेता भी इन्हीं दोनों संभागों पर ध्यान केंद्रित किए हुए हैं| गौरतलब है कि कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव  सरगुजा में विशेष प्रभाव रखते हैं| अंबिकापुर से विधायक सिंहदेव के गृहक्षेत्र से सत्ता छीन पाना भाजपा के लिए मुश्किल है|

ओबीसी खिलाती है कमल

ओबीसी नेताओं का दावा है कि 2013 में ओबीसी वर्ग के दम पर ही भाजपा की सरकार बन पाई| इस वर्ग के एक बड़े सामाजिक नेता ने कहा कि पिछले चुनाव में जब आदिवासियों ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था, तब मैदानी क्षेत्रों से ओबीसी ने ही भाजपा को गद्दी तक पहुंचाया|

आदिवासी बदलते हैं दल

छत्तीसगढ़ में अब तक तीन चुनाव हो चुके हैं| 2003 के पहले और 2008 के दूसरे चुनाव में एसटी वर्ग ने ही भाजपा को सत्ता सुख दिया| 2003 में 34 में से 25 सीटें भाजपा के खाते में गईं, जबकि 2008 में 29 में से 19 सीटें भाजपा को मिलीं, लेकिन 2013 के चुनाव में इस वर्ग ने पाला बदल लिया| इससे 18 सीटें सीधे कांग्रेस के खाते में चली गईं| कहीं न कहीं अगले विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस की आदिवासी वोटर्स को साधने की रणनीति काम आ सकती है|

आंकड़ों पर भी नज़र

प्रदेश में ओबीसी की आबादी और उसके अंदर अलग-अलग जातियों की आबादी को लेकर काफी विवाद है। ओबीसी की आबादी 47 फीसद मानी जाती है, लेकिन यह वर्ग 52 फीसद का दावा करता है| वहीं राज्य की आबादी का 32 फीसद हिस्सा अनुसूचित जनजाति (एसटी) वर्ग का है|  इसमें करीब 42 जातियां शामिल हैं| एसटी वर्ग का सर्वाधिक प्रभाव बस्तर, सरगुजा व रायगढ़ क्षेत्र में है|

Share.