आखिर क्यों, राजस्थान में भाजपा ने वसुंधरा को बनाया चेहरा?

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राजस्थान विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर तमाम अटकलें लगाई जा रही थीं, लेकिन भाजपा ने उन तमाम अटकलों को विराम देते हुए एक बार फिर मौजूदा मुख्यमंत्री वसुंधराराजे पर दांव लगाने का फैसला किया है। एक बार फिर भाजपा राजे के नाम पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है। चुनावी साल में राजस्थान भाजपा बीते दिनों आरोपों के घेरे में थी और माना यह भी जा रहा था कि भाजपा इस बार राजस्थान में किसी अन्य चेहरे को सामने ला सकती है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने रविवार को सारे कयासों पर विराम लगा दिया। 

भारतीय जनता पार्टी का यह फैसला किन विचारधाराओं के मद्देनज़र लिया गया है, इसका अनुमान लगाना मुश्किल है, लेकिन यह भी सच है कि मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे अपने इस शासनकाल में विवादों से घिरी भी रही हैं| ऐसे में भाजपा का यह भरोसा कई सवाल खड़े करता है।

गौरतलब है कि प्रदेश में हुए चुनावों में भी राजे सरकार ने ज्यादा कुछ हासिल नहीं किया है।  2013 से लेकर अब तक राजस्थान में कुल 17 उपचुनाव हुए हैं, जिनमें वसुंधरा राजे को एक बार भी कामयाबी नहीं मिली। यही वजह है कि भाजपा के कई नेताओं ने वसुंधरा राजे के खिलाफ बगावती तेवर अख्तियार कर लिए थे, जिसे दरकिनार कर अमित शाह ने वसुंधरा के नाम का ऐलान किया। वसुंधरा को राजस्थान में चौथी बार  मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में उतारना भाजपा के लिए मजबूरी है या जरूरी, इसे कुछ इन नज़रियों से समझा जा सकता है-

राजे की शक्ति से झुकी भाजपा

यह तो साफ़ है कि वसुंधरा राजे पार्टी आलाकमान को अपनी शक्ति प्रदर्शन से वाकिफ कराने में कामयाब रही हैं।  दरअसल वसुंधरा की जगह किसी दूसरे चेहरे को आगे बढ़ाने पर पार्टी के टूटने का खतरा था| राजस्थान में भाजपा के 80 फीसदी विधायक वसुंधरा के खेमे के हैं और उनके अंधभक्त हैं। ये सभी उनके एक इशारे पर कोई भी कदम उठाने को राजी हैं, और जब विधायक साथ हैं तो भला आलाकमान भी वसुंधरा के आगे कैसे नहीं झुकता। ऐसे में वसुंधरा के नाम पर मुहर लगना लाज़मी था।

अपनी शक्ति का परिचय तो राजे ने तब भी दिया था जब गजेंद्र सिंह की जगह मदनलाल सैनी को प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाया गया।  इससे पहले प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री गजेंद्रसिंह शेखावत को प्रदेशाध्यक्ष बनाना चाहते थे, पर वसुंधरा राजे इस पर राजी नहीं थी। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने राजे को राज़ी करने के लिए सभी जतन किए, लेकिन वे टस से मस नहीं हुईं। आखिरकार आलाकमान को राजे की हठ के आगे घुटने टेकने पड़े।

मजबूत चेहरा हैं राजे

राजस्थान में भाजपा का मतलब है वसुंधरा राजे और वसुंधरा राजे का मतलब है भाजपा।  राजस्थान भाजपा में वसुंधरा राजे के कद का कोई नेता सामने नहीं आया है और यूं कहें तो आने नहीं दिया गया है।  मौजूदा समय में राज्य में वसुंधरा के कद का बीजेपी में कोई दूसरा चेहरा नहीं है।हालांकि पार्टी में ओम माथुर, भूपेंद्र यादव जैसे कई दिग्गज नेता हैं, लेकिन इनके पास जनाधार नहीं है। इसका भी फायदा वसुंधरा के पक्ष में जाता है। इस बात को इससे भी बखूबी समझा जा सकता है कि 2008 के विधानसभा चुनाव में संघ के हाथ हटा लेने के बाद भी वसुंधरा राजे अपने दम पर 78 सीटें जीतने में कामयाब रहीं थीं।

भाजपा को 2019 की चिंता

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को राजस्थान के विधानसभा चुनाव से ज्यादा चिंता अगले साल होने वाले 2019 के लोकसभा चुनाव की है। ऐसे में 2019 से पहले बीजेपी वसुंधरा राजे को नाराज कर किसी तरह का कोई जोखिम भरा कदम नहीं उठाना चाहती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा राजस्थान की सभी सीटें जीतने में कामयाब रही थी। ऐसे में गिरी से गिरी हालत में भाजपा अपनी आधी से ज्यादा सीटें बचाने में कामयाब रह सकती है, लेकिन वसुंधरा को नाराज करके सभी सीटों को नहीं खोना चाहती है।

पक्ष में जातीय समीकरण

वसुंधरा राजे की शादी जाट समुदाय के धौलपुर राजघराने में हुई। राजस्थान में जाट समुदाय 12 फीसदी है, जो वसुंधरा के पीछे एकमुश्त खड़ा है। जाट समुदाय राजनीतिक रूप से भी राज्य में सबसे मजबूत कौम के रूप में है| इसके अलावा ओबीसी मतों को साधने की भी कोशिश की है। ओबीसी मतों के मद्देनजर पार्टी की कमान मदनलाल सैनी को दी गई है।

क्या कहती है राजे का प्रदर्शन?

राजस्थान में 200 विधानसभा सीटें हैं, भाजपा ने 2003, 2008 और 2013 के विधानसभा चुनावों में वसुंधरा राजे के चेहरे पर भरोसा जताया था।  2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को दो तिहाई से ज्यादा बहुमत मिले थे। 163 सीट वसुंधरा के नेतृत्व में मिली थीं जबकि कांग्रेस सिर्फ 21 सीटों पर सिमट गई थी। 2008 में वसुंधरा के नेतृत्व में ही भाजपा उतरी थी।  2008 में कांग्रेस को 96 सीट मिली थीं तो भाजपा को सिर्फ 78 सीट मिली थी, लेकिन 2003 में वसुंधरा के नेतृत्व में बीजेपी को 120 सीट मिली थी, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 56 सीट ही मिली थी।

पॉलिटिकल डेस्क

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