मुद्रा और प्राणायाम पर कार्यशाला

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बालपन में जब हमारा विकास प्रारम्भ होता है, तब अनुशासन की दृष्टि से हमें शिक्षा से जोड़ा जाता है। विद्यालय में रहकर हम अपने आगामी भविष्य के निर्माण की दिशा में प्रवृत्त होते हैं और वही शिक्षा प्रतिवर्ष हमारे भविष्य का निर्माण करती है। धीरे-धीरे यह शिक्षा समाज में हमारा मार्ग प्रशस्त करती है एवं हमारी दृष्टि को विस्तार की ओर ले जाती है, जो कई रूपों में हमारे जीवन के प्रश्नों का समाधान करती है। सामाजिक रहन-सहन के अनुसार, शिक्षा के भी कई रूप समाज में प्रचलित हैं, जो मानवता की दृष्टि से सुलभ हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जो समाज की उन्नति के साथ मानव विकास के पथ पर अग्रसर हैं। शिक्षा के कई रूप हैं, जिनका उद्देश्य केवल सामाजिक सरोकार ही है। इन्हीं परम्पराओं से मैं भी अनुभूत हुआ। समय और जिम्मेदारियों ने इस यात्रा को और आगे बढ़ाया, जिसका संयोग दिव्यता की ओर मुखरित हुआ। समयानुकूल संयोगों, तथ्यों, सूत्रों, समर्पण एवं अभ्यास ने इस विचार एवं दृष्टि को अनन्तता से परिचित कराया, जिसका सुखद अनुभव भावनाओं से जुड़कर सृष्टिमय हुआ। इसी कड़ी के अनुसरण ने अनेक ऋषि, मुनि, योगी, संत, महंत, विद्वान, साहित्यकार एवं समाजसेवकों के सान्निध्य का अनुभव दिया, जो आज भी जारी है।

भारतीय समाज में सनातन परम्परा अनेकों व्याख्या से परिभाषित है, जो अनन्त है। यह मानव जीवन का एक ऐसा सत्य-शोध है, जो मानवता की अनन्त प्रेरणाओं को अपने में समाए रखता है। इसी परम्परा में ‘मानव से माधव’ की यात्रा से परिचित एवं अनुभूत होने का भी निःशब्द, गहन, सुखद अवसर प्राप्त हुआ। ‘कलयुग केवल नाम अधारा। सुमिर सुमिर न उतरहि पारा।।’ विद्वानों ने ‘शब्द’ को ‘ब्रह्म’ की संज्ञा दी है, सत्य ही है। कई शब्द तो हमारे विश्वास का प्रतीक हैं, जिनका स्मरण ही हमें ‘पवित्रता’ से बांध देता है। संसार का आधार भी शब्द ही है, जो हमारे पवित्र मन में निवासरत रहकर निरन्तर अपनी प्रक्रिया में रहते हैं, जो एक दृश्य का निर्माण कर हमारा मार्ग प्रशस्त करते हैं। वहीं दृश्य विभिन्न शब्दों का आधार पाकर विशालता की परिभाषा में आते हैं। वही शब्द हमारे जीवन को तरंगित व उत्साहित करते हैं। जहां शब्द सुखों का आधार है वहीं ज्ञान के अभाव में दुःखों का कारण भी है।

धरती पर मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो विचार करने में सर्वसमर्थ है। इसी विचारशीलता ने मनुष्य को पूजनीय भी बनाया है। महत्वाकांक्षाओं का कोई अन्त नहीं है। आवश्यकताओं और इच्छाओं के संयोग का आधार ही मानव जीवन को सुखमय बनाने की क्षमता रखता है, वहीं सामाजिक विकास की यात्रा में शब्दों का समावेश भी सृजन को उत्तरोत्तर प्रगति प्रदान करता है। ‘पानी रे पानी, तेरा रंग कैसा…जिसमें मिला दो लगे उस जैसा’। सम्भावनाएं अनन्त हैं, जो हमें प्रत्येक क्षण उत्साहित रखती हैं। वही हमें एक सूत्र में पिरोए रखने में सक्षम हैं। वही हमारे प्राण को संचालित करती है। वर्तमान में विषयहीन होना सम्भव नहीं है। आंखों को विश्वास की धारा से बांधकर सुरक्षित प्रवाहित रहना ही लक्ष्यसिद्धि है।

-संजय चौहान, उज्जैन

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