क्या कारगर साबित होगा आयुष्मान भारत ?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सबसे महत्वाकांक्षी आयुष्मान योजना की शुरुआत कर ही दी। पचास करोड़ लोगों को पांच लाख तक का स्वास्थ्य बीमा देने वाली यह दुनिया की पहली योजना है। योजना के तहत आने वाले लोगों के उपचार का खर्च सरकार सीधे अस्पतालों को देगी। करीब तेरह हजार अस्पताल इस योजना से जुड़ चुके हैं। आगे और अस्पतालों को भी इस योजना से जोड़ा जाएगा। इस योजना के तहत देशभर में डेढ़ लाख वैलनेस सेंटर तैयार करने का भी सरकार का लक्ष्य है। इस योजना का लाभ वह परिवार ले सकता है, जिनकी आय का ज़रिया मजदूरी हो और वे भूमिहीन हों। ऐसे परिवार भी इस योजना का फायदा उठा सकते हैं।

इसके अलावा भी कई अन्य लाभ इस योजना से जुड़े हुए हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली और निजी अस्पतालों में उपचार का खर्च न देने में असमर्थ करोड़ों गरीबों को समय पर इलाज़ सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पाती। इसके कारण लाखों लोगों की असमय मौत हो जाती है। इस समस्या से निजात दिलाने के लिए यह योजना लागू की गई है, लेकिन अब देखना होगा कि यह योजना हकीकत में कितनी कारगर साबित होती है। इस योजना के तहत फिलहाल 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 445 जिलों को लाभ मिलेगा। छह राज्यों दिल्ली, केरल, ओडिशा, पंजाब, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल ने इस योजना को स्वीकार नहीं किया है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आयुष्मान योजना को निशाने पर लिया है। आम आदमी पार्टी के अनुसार, मोदी सरकार की इस योजना में प्राथमिक स्वास्थ्य पर बिलकुल ध्यान नहीं दिया गया, जो सबसे ज्यादा ज़रूरी है। केजरीवाल सरकार का कहना है कि स्वास्थ्य के लिए तीन लेवल जरूरी हैं, प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च। इसी के तहत केजरीवाल की सरकार कार्य कर रही है। केजरीवाल सरकार के मुताबिक, इस योजना की सबसे बड़ी खामी है कि  यह योजना सबके लिए नहीं है। केवल गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोग ही इस योजना के पात्र होंगे। वहीं दिल्ली सरकार के अनुसार, इसमें केवल अस्पताल में भर्ती होने वाले मरीज़ों को ही कवर मिलेगा जबकि दिल्ली सरकार मौजूदा समय में हर मरीज़ को मुफ्त दवाएं, टेस्ट और ऑपरेशन की सुविधा दे रही है, चाहे वह भर्ती हुआ हो या नहीं।

बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह योजना सफल रहेगी या नहीं? इस योजना के लागू होने से अस्पतालों में मरीजों की संख्या में इज़ाफा होगा। उनके लिए ज्यादा डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ की भी ज़रूरत होगी, लेकिन सभी जानते हैं कि सरकारी अस्पतालों में स्थिति आज भी दयनीय है। मरीजों के लिए पर्याप्त जगह नहीं है। डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की भारी कमी है।

योजना को कारगर बनाने के लिए सरकार को काफी चुनौतियों का सामना करना होगा। सबसे पहले तो चिकित्सा सेवाओं को मजबूत करना होगा। साथ ही निगरानी का विशेष तंत्र को भी विकसित करना होगा। इस योजना के तहत साठ फीसदी खर्च केंद्र सरकार वहन करेगी और चालीस फीसद बोझ राज्यों पर पड़ेगा। इसमें दो राय नहीं है कि कई राज्य धन जुटा भी नहीं पाएं। इस योजना में घोटालों की भी आशंका बनी रहेगी। भाजपा सरकार को इस पर विशेष तौर पर ध्यान भी देना होगा। वर्ना आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पहले विपक्ष को भाजपा को घेरने के लिए एक और मुद्दा मिल जाएगा।

– कुशाग्र  वालुस्कर

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