हम भी बनें विवेकानंद

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 “तुम अपनी आत्मा को छोड़ किसी और के सामने सिर मत झुकाओ | जब तक  तुम यह अनुभव नहीं करते कि तुम स्वयं देवों के देव हो, तब तक तुम मुक्त नहीं हो सकते|” विचार ही वह माध्यम है, जिससे सत्य को पाया जा सकता है| क्या ईश्वर है और यदि है तो वह किस रूप में है, इसकी जिज्ञासा, लालसा और उस परम शक्ति के प्रति सर्वाधिक प्रेम की भावना यदि किसी में थी तो वे आधुनिक अध्यात्म और भारतीय संस्कृति के पुरोधा स्वामी विवेकानंद ही हो सकते थे |

देश आज भी स्वामी विवेकानंद के विचारों और प्रभाव से पूरी तरह प्रभावित है| आज विवेकानंदजी की पुण्यतिथि पर आइए बताते हैं उनके जीवन से जुड़ी एक रोचक कहानी|

स्वामी विवेकानंद प्रारंभ से ही एक मेधावी छात्र थे और सभी उनके व्यक्तित्व और वाणी से प्रभावित  रहते थे| जब वे साथी विद्यार्थियों को कुछ बताते तो सब मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुनते|एक दिन इंटरवल के दौरान वे कक्षा में कुछ मित्रों को कहानी सुना रहे थे| सभी उनकी बातें सुनने में इतने मग्न थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब मास्टरजी कक्षा में आए और पढ़ाना शुरू कर दिया|

मास्टरजी ने अभी पढ़ना शुरू ही किया था कि उन्हें कुछ फुसफुसाहट सुनाई दी|

” कौन बात कर रहा है ?” उन्होंने तेज आवाज़ में पूछा| सभी ने स्वामीजी और उनके साथ बैठे छात्रों की तरफ इशारा कर दिया|

मास्टरजी  तुरंत क्रोधित हो गए|  उन्होंने तुरंत उन छात्रों को बुलाया और  पाठ से संबधित एक प्रश्न पूछने लगे| जब कोई भी उत्तर न दे सका, तब अंत में मास्टरजी ने  स्वामीजी से भी वही प्रश्न किया, पर स्वामीजी तो मानो सब कुछ पहले से ही जानते थे| उन्होंने आसानी से उत्तर दे दिया|

यह देख उन्हें यकीन हो गया कि स्वामीजी पाठ पर ध्यान दे रहे थे और बाकी छात्र बातचीत में लगे हुए थे| फिर क्या था उन्होंने स्वामीजी को छोड़ सभी को बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी| सभी छात्र एक-एक कर बेंच पर खड़े होने लगे, स्वामीजी ने भी यही किया|

तब मास्टर जी बोले, ” नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद )) तुम बैठ जाओ|”

” नहीं सर , मुझे भी खड़ा होना होगा क्योंकि वह मैं ही था, जो इन छात्रों से बात कर रहा था|”,स्वामीजी ने आग्रह किया|

बचपन से इतने ईमानदार और सच्चे थे विवेकानंदजी| विवेकानंदजी ने केवल आध्यात्मिक अलख ही नहीं जगाया, बल्कि नर सेवा ही नारायण सेवा है, इसका भाव भी उनके कार्यों में दिखाई देता है| जब कलकत्ता में प्लेग फैला, तो उन्होंने अपने स्वास्थ्य का ख्याल न करते हुए भी रोगियों की खूब सेवा की | इसके कारण उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता चला गया और अंततः 4 जुलाई 1902 ई. को मात्र 39 वर्ष की अवस्था में देश के महान विचारक और आध्यात्मिक जगत के इस तारे का प्रकाश ज्ञानरूपी आकाशगंगा से हमेशा के लिए विलोपित हो गया|

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