लड़कियों के सम्मान के लिए खड़ा होना होगा

0

इस साल की शुरुआत में ही बिहार के भोजपुर में दुकान पर सामान लेने गई एक 4 वर्षीय बच्ची के साथ एक युवक ने दुष्कर्म कर उसे मारने की धमकी दी, वहीं कोलकाता में कूड़ा बीनने वाली महिला की 3 साल की बच्ची, जो अपने भाई के साथ खेल रही थी, से बलात्कार किया| उसकी चीखें सुनकर बस के बाहर खड़ा उसका 5 साल का भाई दरवाजा खोलने और बहन को जाने देने की मिन्नत करता रहा| दोनों ही बच्चियां खून में लथपथ अस्पतालों में जीवन और मृत्यु के बीच झूलने को विवश थीं|

एक अन्य घटना में 7 और 10 साल की दो बहनें ट्यूशन से लौटकर घर के बाहर खेलने रुक गईं तभी मोटरसाइकिल पर एक युवक आया और उन दोनों के सामने अपनी पैंट खोलकर खड़ा हो गया और बच्चियों को डराने लगा| हाल ही में बिहार के मुजफ्फरपुर में एक बालिका गृह के भीतर 44 में से 34 बच्चियों के साथ बलात्कार की घटना सामने आई तो उप्र के देवरिया में एक बंद पड़े शेल्टर होम से पुलिस ने 24 लड़कियों को छुड़ाया|

वहां की लड़कियों को जबरन हर रात बड़ी-बड़ी गाड़ियों में बाहर भेजा जाता है| हालांकि यहां रह रही 18 लड़कियों का कोई सुराग़ नहीं है| मप्र के भोपाल में एक छात्रावास में मूक-बधिर आदिवासी युवतियों से दुष्कर्म का मामला भी सुर्ख़ियों में है|

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बलात्कार के मामले 2015 की तुलना में 2016 में 12.4 फीसदी बढ़े हैं| 2016 में देश में बलात्कार के 38,947 मामले दर्ज हुए, जिसमें सबसे ज्यादा मामले (4,882) मध्य प्रदेश में, फिर उत्तर प्रदेश (4,816) एवं महाराष्ट्र (4,189) में दर्ज हुए| दूसरी ओर NCRB के वार्षिक सर्वेक्षण में दिल्ली को महिलाओं के लिए सबसे असुरक्षित शहर माना गया| दिल्ली में साल 2011 से 2016 के बीच महिलाओं के साथ दुष्कर्म के मामलों में 277 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई| रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर एक घंटे में 4 रेप यानी हर 15 मिनट में 1 रेप हुआ है|

महिलाओं के विरुद्ध बढ़ती हिंसा की घटनाओं को देखते हुए पिछले कुछ समय से महिला सुरक्षा का मुद्दा व्यापक बहस का विषय बना हुआ है| इसे ध्यान में रखते हुए पहली बार लैंगिक सुरक्षा मानक (GVI- Gender Vulnerability Index) जारी किया गया| शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी और हिंसा को आधार बनाकर इस सूची को तैयार किया गया| इस सूची में गोवा सबसे सुरक्षित राज्य है, उसके बाद केरल, मिजोरम, सिक्किम हैं और बिहार सबसे असुरक्षित राज्य, उसके बाद दिल्ली, उप्र, राजस्थान इत्यादि का स्थान है| इंडेक्स से स्पष्ट होता है कि उत्तर भारत के राज्यों की तुलना में दक्षिण और उत्तर-पूर्व में महिलाएं ज्यादा सुरक्षित हैं| यहां एक प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि महिलाएं आर्थिक व सामाजिक रूप से जितनी सशक्त हुई हैं, उनके विरुद्ध हिंसा की घटनाएं उतनी ही ज्यादा बढ़ी हैं, क्यों?

क्या इन सब घटनाओं के बाद भी महिला दिवस का कोई मायने हैं? ये 3 से 10 साल की बच्चियां किस तरह के समाज की छवि लेकर बड़ी होंगी? घटना पढ़ या सुनकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं तो सोचिये उन बच्चियों पर क्या गुज़रती होगी, जिन्होंने अभी समाज का मतलब भी नहीं जाना, अभी तो अपने जीवन को भी नहीं जान पाई, जिनकी दुनिया अभी परिवार, खेलकूद, स्कूल, दोस्त-सहेली, त्यौहार मनाना, खुश होना, नाराज़ होना भर ही है| यह घटनाएं तो मात्र संकेत भर हैं, न जाने कितनी घटनाएं रोज घटती हैं| हम श्रेष्ठ और तीव्र गति से विकसित होती अर्थव्यवस्था के नाम पर आए दिन अपनी पीठ थपथपाते नज़र आते हैं| यह कैसा विकास है, जहां जानवर और मानव में कोई अंतर नहीं रह गया| इन छोटी मासूम बच्चियों में भी उन्हें सिर्फ ‘शरीर’ नज़र आता है| क्या इनकी खुद की बेटी,भतीजी, भांजी या बहन इनके साथ सुरक्षित है? आखिर कहां रुकेगी यह हैवानियत और कैसे रुकेगी? क्योंकि कोई भी कानून इन्हें नहीं रोक पा रहा, बल्कि दिन-प्रतिदिन ये खबरें सुर्ख़ियों में बनी रहती हैं| समाज से इन वहशी दरिंदों का सफाया कैसे किया जाए? कुछ कहते हैं कि लड़कियों की पोशाक इन घटनाओं को आमंत्रण देती है, पर इन मासूमों के लिए भी यही तर्क दिया जा सकता है? कुछ लोग कहते हैं कि ऐसे लोग मानसिक रूप से विकृत होते हैं इसलिए वे इन घटनाओ को अंजाम देते हैं| यदि यही कारण है तो इन्हें खुला क्यों छोड़ रखा है, इन्हें तो मानसिक चिकित्सालयों में रखना चाहिए| पर क्या ऐसे लोगों की कोई पहचान हो सकती है? ऐसे अनेक सवाल रोज मुझे परेशान करते हैं और संभवतः आपको भी करते हों?

प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी ने अपनी एक कहानी में लिखा है कि एक पुरुष के प्रति अन्याय की कल्पना से ही सारा पुरुष समाज उस स्त्री से प्रतिशोध लेने को उतारू हो जाता है और एक स्त्री के साथ क्रूरतम अन्याय का प्रमाण पाकर भी सब स्त्रियां उसके अकारण दंड को अधिक भारी बनाए बिना नहीं रहती| इस तरह पग-पग पर पुरुष से सहायता की याचना न करने वाली स्त्री की स्थिति कुछ विचित्र सी है| वह जितनी ही पहुंच के बाहर होती है, पुरुष उतना ही झुंझलाता है और प्राय: यह झुंझलाहट मिथ्या आरोपों के रूप में परिवर्तित हो जाती है| एक औरत का जब रेप होता है या उसके साथ किसी भी तरह की हिंसा होती है तो सारी दुनिया इसके पीछे औरत की ही गलती ढूंढने लग जाती है, जैसे उसके कपड़े छोटे थे या कम थे, देर रात को अकेले घर से बाहर थी, लड़कों के साथ घूमती है, आवारा है आदि| हमारी परवरिश कुछ इस क़दर की गई है कि हम हर बात के लिए लड़कियों को ही दोषी ठहराते हैं। क्यों है ऐसी मानसिकता हमारी? कुछ समय पूर्व की एक ख़बर के अनुसार, एक स्कूल में एक लड़की के साथ उसके ही सहपाठी ने दुष्कर्म किया परन्तु स्कूल का इंसाफ देखिये उस अभियुक्त लड़के को तो स्कूल आने से नहीं रोका परन्तु लड़की को स्कूल से निकाल दिया ताकि दूसरी लड़कियों पर बुरा असर न पड़े| उस लड़की का लड़की होना ही सबसे बड़ा दोष है या उसका लड़की होना पुरुष समाज को यह अधिकार दे देता है कि वह उसके साथ कुछ भी कर सकता है?

क्यों समाज बलात्कार होने पर लड़की का तिरस्कार करता है, लड़के का क्यों नहीं? क्यों मंदिरों में स्त्री के देवी रूप की पूजा की जाती है और मंदिर के बाहर घर या सड़कों पर उसका शोषण करने से भी उसे गुरेज़ नहीं होता? मुझे लगता है कि केवल इतना ही काफी नहीं है अपितु इसे समाप्त करने में भी महिलाओं को आगे आना होगा, उन्हें अपने बेटों को लड़कियों की इज्जत करना सिखाना होगा, उनसे कैसे बात करनी चाहिए सिखाना होगा, घर के बाहर कैसे व्यवहार करना है, भाई-बहन में समानता का गुण विकसित करें, समान अधिकार देने होंगे, खान-पान, पहनावा, शिक्षा, करियर, विवाह इत्यादि की दृष्टि से समानता लानी होगी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि लड़कियों के प्रति बोली जाने वाली भाषा और शब्दावली में सुधार को प्रोत्साहित करना होगा, लैंगिक पूर्वाग्रहों को समाप्त करना होगा इसलिए ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ या लड़कियों की शिक्षा को अनिवार्य कर देना इस समस्या का हल नहीं है बल्कि लड़कियों के सम्मान के लिए खड़ा होना होगा| तब कहीं जाकर शायद महिला दिवस मनाने और नवरात्रि में कन्या पूजन को सार्थक कर पाए|

-डॉ.ज्योति सिडाना, कोटा (राजस्थान) 

(लेखिका वरिष्ठ प्राध्यापिका हैं)

Share.