जीवन में द्वैध था, पारदर्शिता नहीं थी

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इंदौर के मेरे भक्त और प्रेमी उदयसिंह देशमुख, जिन्हें लोग भय्यू महाराज के नाम से जानते हैं, उनके निधन की खबर सुनकर मैं सन्न रह गया। अभी कुछ दिन पहले बैतूल (मप्र) में एक पुस्तक-विमोचन कार्यक्रम में वे मेरे साथ रहनेवाले थे। बहन उमा भारती तो पहुंची, लेकिन वे नहीं आए। हम मंच से अभी उतर ही रहे थे कि उनका फोन आया। कह रहे थे कि उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। नहीं पहुंच पाने के लिए क्षमा मांग रहे थे। दो-तीन महीने पहले जब वे अस्पताल में भर्ती थे, तब भी उन्होंने फोन पर मुझसे काफी देर बात की थी। मैं उनकी कई निजी परेशानियों से परिचित था, लेकिन मैं उनको इतना मेधावी और साहसी समझता था कि मैं स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकता था कि वे आत्महत्या कर लेंगे। उन पर जब पुणे में हमला हुआ था, तब भी उन्होंने फोन पर मुझे सब विस्तार से बताया था।

वे मुझे अपने बुजुर्ग की तरह मानते थे और जब भी मिलते थे तो चरण-स्पर्श जरूर करते थे। उन्होंने कोई सम्मान-पुरस्कार भी स्थापित किया था। पहला पुरस्कार उन्होंने अन्ना हजारे को दिया था और मेरे मना करने पर भी दूसरा पुरस्कार मेरे नाम पर घोषित कर दिया था। उनके आग्रह के कारण मुझे मजबूरन उस समारोह में जाना पड़ा। मैं उनसे कहा करता था कि उदयजी आप अपने आपको संत-वंत कहलाना बंद कीजिए। सदगृहस्थ होना संत होने से बड़ा काम है। यदि आप पूर्ण सदाचारी हैं और निर्लिप्त हैं तो आप संतों के लिए भी पूज्य हो जाएंगे। उन्होंने मप्र सरकार द्वारा प्रदत्त मंत्री का दर्जा भी मेरे लिखने पर छोड़ दिया।  उदयसिंह देशमुख ने छोटी उम्र में ही कई बड़े काम कर डाले। उन्होंने महाराष्ट्र, गुजरात और मध्यप्रदेश में अनेक जलाशय, बांध, नहर आदि बनवाए।

अपने पीछे अपने अनेक भक्तों और प्रशंसकों को वे छोड़ गए हैं, लेकिन उनके प्रति अत्यंत स्नेह भाव रखने के बावजूद मुझे यह कहना पड़ रहा है कि उनके जीवन में द्वैध था, पारदर्शिता नहीं थी। इसी कारण उनके जीवन में अर्थ और काम छा गए। धर्म और मोक्ष पीछे छूट गए। अर्थ और काम ने उन्हें सतत सांसत में डाल रखा था। इसी कारण पारिवारिक कलह असीम हो गया। वे बहुत बेचैन रहने लगे। इसके पहले भी कुछ मामलों में उन्हें बदनामी झेलनी पड़ी थी। वे बहुत नाजुक मिजाज थे। गुस्से में आकर उन्होंने क्या कर डाला ? वे जीते रहते तो शायद उनका जीवन सुधरता और वे देश की बहुत सेवा करते। मध्यान्ह में सूर्यास्त हो गया! मुझे बहुत दुख है।

 

 

– डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

 

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