अपराध व भ्रष्टाचार के लिए कठोर दंड का प्रावधान हो

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समय, सत्ता, संपत्ति और शरीर सदा किसी का साथ नहीं देते, वैसे ही गलत तरीके से अर्जित किया हुआ धन भी साथ नहीं देता, परन्तु शिक्षा, संस्कार, सरल व सच्चा आचरण, स्वभाव,समझदारी,सत्संग,सच्चे संबंध व मेंहनत एवं ईमानदारी से कमाया धन सदा हर वक्त जीवन के हर पड़ाव में  साथ देता है। धन अर्जित करने व जीवन यापन के लिए ईश्वर ने  प्रकृति के माध्यम से  मनुष्य को समान अवसर पर कर्म, योग्यता एवं क्षमता अनुसार प्रदान किया है , पर मनुष्य के लालच, स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा एवं किसी भी अवसर का उचित लाभ लेने व उससे धन अर्जन करने के तरीके ने व्यक्ति को  अपराध व भ्रष्टाचार को शिष्टाचार मान अपना अधिकार समझ धन आसानी एवं गति से अर्जित करने का महत्वपूर्ण साधन बना लिया है।

भ्रष्टाचार व कोई भी अपराध भले ही वर्तमान में हमारे देश में एक ज्वलंत विषय बना हुआ है, पर इसकी  नींव तो देश में ब्रिटिश शासनकाल में ही रख दी गई थी, जिसके कारण देश को उनके द्वारा गुलाम बनाया गया था और इसी आचरण को वे हमें भी विरासत में भी दे गए, जिसका पालन-पोषण हमारे आस्तीन के सांप रूपी कुछ राजनेता,  सरकारी कार्यालय में बैठे कुछ अधिकारियों व लालची व्यापारियों ने परंपरा स्वरूप जारी रखा है, जिसका नतीजा यह है कि अब सामान्य व्यक्ति भी इसी रंग में रंगकर यही मानकर चलता है कि इस देश में  बिना  पैसे लिए या दिए  कोई कार्य कहीं नहीं होता अर्थात अनैतिकता और अनुचित आचरण किसी भी काम का महत्व करने वाले की नीयत तय करती है। अब तो कार्य की सफलता भ्रष्टाचार व अपराधों को बल देने की प्रेरणा का कार्य करने लग गई है| चुनाव में वोट व अदालत में गवाह आसानी से पैसे के दम पर खरीद लिए जाते हैं।

भारत में लगभग सभी जगह इस तरह के आस्तीन के सांप राजनीतिक दलों में, सरकारी कार्यालय, कॉरपोरेट जगत, व्यापार पटल, मीडिया जगत और न्यायपालिकाओं में भ्रष्टाचार को  एक विचार व आचरण बनाकर रख दिया है, जिसका व्यापक असर भी हमें पूरे राष्ट्र में देखने को  मिलता है,  जिसकी शुरुआत आज़ाद भारत में सन 1948 में जीप घोटाले व  1951 में मृदल मामले से हुई ।

आज भी देश में कई आर्थिक-आपराधिक  मामले न्यायालय या संबंधित विभाग में विवेचना के लिए लंबित पड़े हैं, जिनमें तारीख पर तारीख ही मिल रही है, परिणामस्वरूप देश से 70 सालों में गरीबी तो नहीं हटी पर स्वार्थी व भ्रष्ट राजनेताओं व अधिकारियों ने गरीबों का हक़ बोफोर्स घोटाला- 64 करोड़, यूरिया घोटाला-133 करोड़, चारा घोटाला- 950 करोड़, शेयर बाजार घोटाला-4000 करोड़, सत्यम घोटाला-700 करोड़, स्टाम्प पेपर घोटाला- 43 हजार करोड़, कॉमन वेल्थ घोटाला-70 हजार करोड़, 2 g स्पेक्ट्रम घोटाला- 1 लाख 67 हजार करोड़, अनाज घोटाला, 2 लाख करोड़, कोयला खदान आवंटन घोटाला-12 लाख करोड़ रुपए, अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाला  के रूप में  प्रमाणों सहित हजम कर गए, जिसने देश को भी कई वर्ष पीछे धकेल दिया और देश को  विश्व में अपराध  जगत में अपना उच्च स्थान कायम रखने में कामयाब रहे हैं।

दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि कई वर्षों  के बाद भी सबसे बड़े प्रजातंत्र वाले देश में सबसे मजबूत संविधान और न्यायपालिका होने के बावजूद हम इस पर लगाम नहीं लगा पाए| साथ ही आस्तीन के सांपों ने अपने कुकर्मों पर पर्दा डालने के लिए  समय-समय पर भेड़ की खाल ओढ़ छलने का क्रम भी जारी रखा है और जनता का ध्यान बंटाने के लिए ये एक-दूसरे पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाने से भी नहीं चूकते।

विश्व का शायद ही कोई ऐसा देश होगा, जो आतंकवाद, नक्सलवाद, तानाशाही, नारी उत्पीड़न, दासप्रथा, लूट, बेनामी संपति, फिरौती, वेश्यावृत्ति, जमाखोरी, घूसखोरी जैसे जघन्य कामों को अपराध नहीं मानता हो और इन अपराधों के लिए कोई सज़ा न रखी हो, इसके बावजूद किसी भी व्यक्ति के लिए  किसी  भी पद का गलत इस्तेमाल करना एक आदर्श आचरण बन गया है, क्या यह  राष्ट्र को धोखा देना नहीं है ? बहरहाल, फिर भी ऐसे लोग दीमक की तरह ही देश को खोखला करने में लगे हैं परिणामस्वरूप  गरीबों के हक़ का पैसा विदेशी बैंकों या भ्रष्ट और बेईमान व्यक्ति की तिजोरी में बंद है, अमीर और अमीर व गरीब और गरीब होता जा रहा है व ईमानदार व्यक्ति मध्यम श्रेणी में अपना शोषण करवाने में मजबूर है।

अब तो नौकरी व राजनीतिक पद भी धन के बल पर ही अर्जित किए जा सकते हैं, कई नेताओं व अधिकारियों ने सांठ-गांठ कर  कितनी ही कंपनियों को बर्बाद कर दिया, विदेशी बैंकों में पैसा जमा कर उन्हें मालामाल व राष्ट्रीय बैंकों को कमजोर किया, जिसकी वजह से  भारतीय गरीब और गरीब और गरीब होता गया, लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा क्योंकि हमारा धन तो स्विस बैंक में जमा है, सोचिए कितना धन भ्रष्ट राजनेताओं व अधिकारियों ने अपनी आस्तीन में छुपा रखा है।

यदि देश को अब भी अपराध व भ्रष्टाचार से मुक्त न किया गया तो इसके  परिणाम घातक ही नहीं, देश को पुनः गुलाम बनाने के लिए भी काफ़ी होंगे| समय की मांग व हालातों को देखते हुए पुनः आज सम्पूर्ण क्रांति की देश में आवश्यकता  है, जिसमें विशेषाधिकार और विवेकाधिकार हटा दिए जाएं, काली कमाई को राजसात करने का प्रावधान हो, भ्रष्ट व अपराधी तत्वों को चुनाव लड़ने में कड़ी पाबंदी हो और सबसे महत्त्वपूर्ण भ्रष्टाचार की शिकायतों  पर तेज कार्रवाई के साथ समय सीमा निर्धारित हो , लोकसेवकों वाले हर पद पर योग्यता निर्धारित हो| साथ ही साथ हर अपराध व भ्रष्टाचार के लिए कठोर दंड  का प्रावधान हो।

-विशाल सक्सेना

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