प्रधानमंत्री आवास योजना की सच्चाई

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केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके अधीन नेताओं और मंत्रियों ने मिलकर कई योजनाओं की शुरुआत की| इन्हीं योजनाओं में से एक हैं ‘प्रधानमंत्री आवास योजना’| योजना का मुख्य उद्देश्य ऐसे गरीबों को घर बनवाकर देना है, जिनके पास खुद का आशियाना नहीं है| नेताओं की फितरत हम सभी जानते हैं, वे कहते कुछ हैं और करते कुछ| वर्ष 2022 तक के लक्ष्य की बात कर रही सरकार ने अभी तक केवल 2 फीसदी ही काम किया है| शहरी आवास योजना की अपेक्षा ग्रामीण आवास योजना की कहीं बेहतर स्थिति है|

इंदिरा आवास योजना में जहां लाभार्थी को 75 हज़ार रुपए आवास बनवाने के नाम पर दिए जाते थे, वहीं अब इस प्रधानमंत्री आवास योजना में प्रति लाभार्थी को 1 लाख 20 हज़ार रुपए और 12 हज़ार रुपए कुल 1 लाख 32 हज़ार रुपए दिए जा रहे हैं| इससे गरीबों का अपना आशियाना बनाने का सपना पूरा हो सके, लेकिन ब्लॉक के कर्मचारियों और अफसरों ने इस योजना को भी घोटाले की भेंट चढ़ा दिया| पहले कई वादे किए गए कि इस योजना में घोटाला सहन नहीं करेंगे, हर एक पात्र गरीब को घर बनाकर दिया जाएगा, लेकिन असल में हुआ कुछ और ही|

यह सभी जानते हैं कि कितने गरीब अभी भी सड़क पर गुजारा कर रहे हैं और इधर नेता अपनी जेब भरकर अपने आशियानों की संख्या लगातार बढ़ा रहे हैं| वैसे तो पीएम मोदी भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाने की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठा रहे हैं| अपने द्वारा किए गए कार्यों की गाथा बड़े-बड़े दावों के साथ कर रहे हैं, लेकिन असल बात कुछ और ही है|  न तो योजनाएं भ्रष्टाचार से मुक्त हो रही हैं

और न ही भ्रष्टाचारियों पर लगाम लग रही हैं और तो और जो दावे किए जा रहे हैं उनमें भी सच्चाई नहीं रही| आज हम आपके सामने प्रधानमंत्री आवास योजना के कुछ तथ्य रख रहे हैं, जिनसे आप जान लेंगे कि घोटाला कहां हो रहा है और कौन कर रहा है?  कैसे खुद नियम बनने वाले नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं|

अधर में योजना

बीते तीन वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के तहत केवल 8 फीसदी कार्य ही किया गया है| दरअसल, मोदी सरकार के लक्ष्य के अनुसार तीन वर्ष में शहरों में गरीबों के लिए लगभग 40 लाख मकान का निर्माण किया जाना था, लेकिन अभी लगभग 3 लाख मकान ही बन पाए हैं, लेकिन मोदी सरकार की तारीफ करनी पड़ेगी कि उन्होंने शहरों से ज्यादा गांवों में इस दिशा में कार्य किए हैं|  गांवों में तीन वर्षों में मकान बनाए का लक्ष्य लगभग 95 लाख रखा गया था, जिसमें से 28 लाख मकान योजना शुरू होने के आधे समय में ही बन गए|  भले ही टारगेट आधा भी नहीं हुआ हो, लेकिन समय आधा जरूर बीत गया है|

सिद्धार्थनगर का फर्जीवाड़ा

प्रधानमंत्री आवास योजना और इसके अंतर्गत कार्य करवा रहे अफसरों की पोल तो तब खुल गई, जब उत्तरप्रदेश के सिद्धार्थनगर का बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया| दरअसल, यहां पर योजना के अंतर्गत 84 मकान बनाए गए, जब इन मकानों के बारे में विपक्ष ने जांच की तो पता चला कि 84 में से 70 ऐसे लोगों के मकान बनाए गए थे, जो योजना के नियमों के अनुसार अयोग्य थे|

वैसे तो इस घोटाले का उजागर होना ही किसी बड़े सबूत से कम नहीं है| योजना में किस प्रकार गोलमाल किया गया, इसके लिए जांच कमेटी बिठाई गई और अभी तक बस जांच ही की जा रही है | यह जांच भी अन्य योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई|

भोपाल में गड़बड़झाला

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में भी प्रधानमंत्री आवास योजना के नाम पर हुए  गड़बड़झाले का खुलासा लगभग दो वर्ष पूर्व हुआ था, जिसमें कई अधिकारी और नगर निगम सवालों के घेरे में आ खड़े हुए थे| यहां पर निगम और ‘सिंडिकेट’ ने मेला लगाकर गरीबों को लूटने की साजिश बनाई थी| इस साजिश के अंतर्गत पहले लोगों को बताया गया कि 4.5 लाख में मकान बनाकर दिए जाएंगे| इसके लिए बाकायदा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की फोटो लगाकर मेले का शुभारंभ किया गया, लेकिन जब लोग वहां पहुंचे तो उन्हें घर सिर्फ कागजों में दिखाए| चार लाख पचास हजार की जगह सात से नौ लाख का प्लान समझाने लगे| इतना ही नहीं वैट और रजिस्ट्री के नाम पर भी भारी भरकम रकम बताई गई|  घोटाले का खुलासा होने से पहले मेयर मेले के आयोजक बन योजना का गुणगान कर रहे थे, लेकिन जैसे ही सवाल उठाने लगे, सिंडिकेट के खेल के बारे में उनसे पूछा जाने लगा तो वे सब कुछ भूल गए| उन्होंने बस जांच के आदेश दिए, जो अभी तक चल ही रही है|

पीएम आवास में मवेशी

प्रदेश में ही कई गांवों में कागजी रूप से तो मकान कब के बनकर तैयार हो गए,  लेकिन जब जांच की गई तो पता चला कि मकान के नाम पर कहीं दीवार तो कहीं पिलर ही खड़े किए गए हैं| लोग उस स्थान पर रहने के बजाय वहां अपने मवेशियों को बांधना पसंद कर रहे हैं| और तो और अधिकारी अपनी साइट्स पर अधूरे मकानों को भी पूरा करके दिखा रहे हैं और वाहवाहियां लूट रहे हैं|

दरअसल, कई जिलों में मकान पूर्ण होने की फोटो वेबसाइट पर अपलोड कर दी गई, जबकि हकीकत में उनमें से बहुत से मकान अधूरे हैं| यहां घरों में सामने की दीवार को बनाकर उस पर रंगरोगन कर हितग्रहियों के नाम लिख दिए और फोटो खींच लिए गए| जब इस मामले में संबंधित जिले के ज़िला पंचायत अधिकारी से बात की गई तो फिर जांच के आदेश मिले, जो नवंबर 2017 से अभी तक जारी है|

प्रधानमंत्री आवास योजना में जहां गरीबों को मकान उपलब्ध कराए जाने चाहिए, वहां कई तरह का फर्जीवाड़ा करके गरीबों के खून-पसीने की कमाई लूटी जा रही हैं| कई जगह ऑनलाइन रूपए जमा करने का लालच दिया जा रहा है तो कई जगह एनजीओ बनाकर जनता को लूटा जा रहा है|

जब तक घोटाले उजागर नहीं होते, तब तक अधिकारी अपनी जेबें भरते रहते हैं और जब घोटालों के बारे में सबको पता चल जाता है तो मिलीजुली साजिश के तहत जांच के आदेश दे दिए जाते हैं और यह जांच वर्षों चलती रहती हैं| गरीबों को वास्तव में उनके आवास कब मिलेंगे? जांच आयोगों के परिणाम कब आएंगे ? इन सभी सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में छिपे हैं|

-रंजीता पठारे

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