संतों से तो फिर आम आदमी ज्यादा अच्छा  

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जब वे उदय देशमुख थे और महेंद्रा सीमेंट में मैनेजर थे, तब से महेंद्र बापना और मेरी मित्रता थी। वे चेन स्मोकर थे| जितनी देर में मेरी कट चाय ख़त्म होती, उतने समय में वे दूसरी सिगरेट सुलगाने की तैयारी में होते। हमारा मुलाक़ातों का सिलसिला कम हुआ, लेकिन वे उतनी ही तेज़ी से उदयजी, भय्यूजी, भय्यू महाराज और राष्ट्रसंत हो गए। मुलाक़ातों में कमी ज़रूर आई, लेकिन मोबाइल पर संपर्क बना रहता था| उम्र में छोटे होते हुए संत वाले आभामंडल का व्यक्तित्व दादा भाई प्रणाम के संबोधन और अति सम्मान से बात शुरू करे तो मुझे बड़ा अटपटा लगता था। 

आज आश्चर्य अधिक हुआ, खबर सुनते ही दिलोदिमाग़ में शब्द गूंजे कि यह आदमी पगलोट तो नहीं है। पगलोट यानी अपेक्षा के विपरीत कोई काम कर दे। मप्र से लेकर महाराष्ट्र तक हताश-निराश युवाओं को प्रेरणा देने वाला, क़ैदियों को नई जिंदगी देने वाला, टूटन की कगार पर पहुंच चुके परिवारों की गृहस्थी व्यवस्थित करने वाला खुद अपने जीवन से इतना हताश हो जाए कि कनपटी पर रिवॉल्वर अड़ाकर धांय कर दे, उसे पगलोट नहीं तो और क्या कहेंगे। अन्ना से लेकर मोदी और प्रतिभा पाटिल से लेकर लता मंगेशकर और बड़े बड़े उद्योगपतियों ने क्या चमत्कार देखे, वे सब तो बताएंगे नहीं, लेकिन अपन ने कोई चमत्कार महसूस नहीं किया तो उसकी पहली और अंतिम वजह यही होगी कि पत्रकारिता का कीड़ा कुलबुलाते रहने के कारण हमेशा नेगेटिव थॉट पहले आता है, भले ही लिखते वक्त पॉज़िटिव सोच क्यों न हो जाए।

भय्यू महाराज से जिन-जिन ने जो फ़ायदे उठाने थे उठाए, शायद इसीलिए ‘पोलिटिकल पॉवर वाला मीडिएटर’ जैसा ठप्पा भी लगा। अपन ने भय्यू महाराज वाले उनके रूप में उस उदय देशमुख के प्रति सम्मान भाव रखा, जिसकी पहल से महाराष्ट्र के दुष्काल पीड़ित किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों में कमी आई, युवा रोज़गार से जुड़े, तालाबों की, गोदावरी सहित अन्य नदियों की दशा सुधरी, क़ैदियों की सोच में बदलाव आया, पौधरोपण और पर्यावरण रक्षा की दिशा में काम हुए, गांवों में पेयजल संकट से निजात के उद्देश्य से काम किए। इन कामों में जब राज्य सरकारों का सहयोग नहीं मिला तो  उन्हें आक्रामक होते और फिर मुख्यमंत्रियों को नतमस्तक होते भी देखा।

जो बात विचलित किए हुए है, वह यह कि ऐसा कितना तनाव कि लोगों का जीवन सुधारने वाला राष्ट्रसंत ही हताश होकर अपना जीवन समाप्त कर ले। फिर तो आप-हम सब गृहस्थ अच्छे, जो हर दिन तनावों में जीते हैं, थक-हारकर चिंता के बिछौने पर सोते हैं, सुबह उठकर फिर किसी चुनौती, समस्या या तनाव का सामना करने के लिए कमर कस लेते हैं, लेकिन आत्महत्या के लिए सोचने का वक्त नहीं निकाल पाते हैं। फिर लगता है कि यह सब प्रारब्ध रहता है वरना कृष्ण को कोई बहेलिया मार सकता था, मर्यादा पुरुषोत्तम को जलसमाधि क्यों लेनी पड़ी। आम आदमी को तो यह भी याद नहीं रहता है कि चार दिन पहले क्या खाना खाया था, संत लोग अपने भूत-भविष्य को नहीं जान पाते क्या? यही प्रश्न मेरे दिमाग़ में तब भी कौंधा था, जब भय्यू महाराज की पत्नी माधवी का अकस्मात् निधन हुआ या उससे पहले खुद भय्यू महाराज एक भीषण एक्सीडेंट के शिकार हुए थे।

ये सारी बातें दिमाग़ में कौंध रही थी और मैं अस्पताल की तरफ़ गाड़ी भगा रहा था। व्हाट्सएप पर दौड़ते मैसेज को कन्फर्म करने के लिए मुझे भी यहां-वहां से मित्रों के फोन आते रहे| सबका पहला सवाल यही था कि भय्यू महाराज की खबर सही है क्या ? इसके जवाब में दूसरा प्रश्न क्यों मारी गोली, मेरे जवाब से पहले ही अपने पूछे प्रश्न का उत्तर भी मित्र लोग ही दे रहे थे कि दूसरी शादी का चक्कर होगा, वैसे करना नहीं थी। मैं हां, हूं करते हुए चाह रहा था कि बात जल्दी खत्म करे तो मैं बॉम्बे हॉस्पिटल में बढ़ रहे वीआईपी के हुजूम पर नजर रख सकूं।

मोबाइल पर जानकारी चाहने वाले अपने प्रश्न का खुद ही उत्तर भी देते जा रहे थे। करना नहीं थी दूसरी शादी। इतने बड़े संत को ऐसी क्या जल्दी पड़ी थी कि पहली पत्नी की मौत को एक साल भी नहीं हुआ और अपनी सेक्रेटरी से शादी कर ली। मुझे तो लगता है कि इस शादी के कारण जो थू-थू होने लगी थी, उसी का टेंशन होगा। क्यों उनकी लड़की (कुहू) की नहीं पटती थी उनसे| मैंने बात समाप्त करने के लिहाज़ से कहा, मुझे कुछ पता नहीं है इस बारे में।

अस्पताल के बाहर मीडियाकर्मियों की भीड़ यथावत थी, पुलिस फोर्स बढ़ा दिया गया था। अस्पताल के अंदर से बाहर आ रहे मरीज़ और उनके परिजन समझ नहीं पा रहे थे माजरा क्या है ? गेट पर तैनात गार्ड और पुलिस जवानों ने मीडिया का प्रवेश बंद कर रखा था। वहीं लोग जा सकते थे, जो गेट पास दिखा रहे थे। भय्यू महाराज की पुत्री, आश्रम और भय्यू महाराज के ख़ास लोगों को भी परिचय देने के बाद ही अंदर जाने दिया जा रहा था। कलेक्टर और कमिश्नर से लेकर अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के साथ ही राज्यमंत्री कंप्यूटर बाबा, विधायक रमेश मेंदोला, विभिन्न दलों के नेता और पूर्व विधायकों का तांता लगा था। इन सब की बातों को सुनते हुए लगा कि ये सब भी वही कह रहे हैं, जो मैं सोच रहा था। रह-रहकर अज़ीज़ नाजा की वह क़व्वाली भी याद आ रही थी, जो फ़ैमिली ग्रुप पर भतीजी ने दो दिन पहले पोस्ट की थी, चढ़ता सूरज धीरे-धीरे, ढलता है ढल जाएगा….। भय्यू महाराज ने तो खुद अपने हाथों से सूरज पर ग्रहण लगा दिया। इनका ऐसा अप्रत्याशित अंत या अपने कर्मों से जेल में सड़ते आसाराम, राम-रहीम और भागते फिर रहे दाती महाराज ऐसे सारे चेहरे अब डराने लगे हैं । जो संत अपनी काम वासना पर, ग़ुस्से पर क़ाबू न रख पाए, हताशा का शिकार हो जाए, उनके फरेब  हमें चौंकाने लगें, फिर भी हमारी आंखें न खुलें तो दोष हमारा ही रहेगा।

ऐसे सारे संतों से तो हम गृहस्थ अच्छे, खेत में फ़सल उगाने वाला किसान अच्छा जो सारी झंझटों को दशकों से सहता आ रहा है और पानी सिर से ऊपर निकल जाने की स्थिति में ही फांसी का फंदा गले लगाता है। जमानेभर को ज्ञानगंगा में गोते लगवाने वाले राष्ट्रसंत सवा साल में ही इतने अवसादग्रस्त हो गए कि उन्होंने जीवनलीला ही समाप्त कर ली। परिवार में किसी सदस्य का बीमार होना यानी पूरे परिवार का बीमार होने जैसा हो जाता है, वैसे ही किसी की आत्महत्या से पूरा परिवार भी तो घुट-घुटकर मरता है।  वृद्धा आई को अब किसका भरोसा, अक्का को तो दूसरी शादी के लिए भय्यू महाराज को दिए उस वचन का अब पालन करना है कि कुहू को हम संभाल लेंगे? सर्वाधिक संकटग्रस्त रहेंगी दूसरी पत्नी आयुषी, न चाहते हुए भी उन्हें भय्यू महाराज के इस कदम का कलंक झेलना पड़ेगा।

-कीर्ति राणा 

   (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

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