बच्चों के कंधों से कम होगा बोझ

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स्कूली बच्चों और उनके परिजन के लिए अच्छी खबर है कि अब पहली से दसवीं कक्षा तक के बच्चों के लिए स्कूली बस्ते का वजन निर्धारित कर दिया गया है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नए दिशा-निर्देश जारी कर कहा है कि पहली से दूसरी कक्षा तक बस्ते का वजन 1.5 किलोग्राम और दसवीं कक्षा के लिए अधिकतम वजन पांच किलो तक होगा। इसके अलावा पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के लिए किसी तरह के होमवर्क पर भी पूर्णतः पाबंदी लगा दी गई है। देश में जब से निजी स्कूलों का आगाज़ हुआ है, तब से मासूम बच्चों पर बस्ते और होमवर्क का सिलसिला कुछ ज्यादा ही बढ़ने लग गया है।

निजी स्कूल यह जताने का प्रयास करते हैं कि हम बच्चों की शिक्षा को लेकर गंभीर हैं और इसी वजह से हमारी फीस अभिभावकों को ज्यादा लगती है। अभिभावकों ने इस बोझ को स्वीकार भी कर लिया तो यह सिलसिला लगातार बना ही रहा। प्रोफेसर यशपाल समिति ने 1992 में ही अपनी सिफारिशों में इस बोझ को हल्का करने को कहा था, परंतु सरकारों ने सिफारिशों को लेकर कोई गंभीरता नहीं दिखाई। मासूम बचपन पर बस्ते का बोझ और उसके मन पर पड़ते असर की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया।

जब यह सामने आया कि बच्चों में हड्डी-दर्द और अन्य मानसिक बीमारियां बढ़ रही हैं तो असली कारण सामने आया और मंत्रालय ने बच्चों की सुध ली। बस्ते का वजन कम करने के साथ-साथ अब कक्षा में शिक्षा देने के बारे में कहा गया है कि पहली व दूसरी कक्षा के बच्चों को सिर्फ मातृभाषा और गणित पढ़ाई जाएगी। तीसरी से पांचवीं कक्षा तक के बच्चों को भी निर्धारित तीन विषय एनसीईआरटी की किताबें से ही पढ़ाए जाएंगे। शिक्षा व्यवस्था पर किए गए ज्यादातर अध्ययन यह बताते है कि स्कूली बच्चों में पढ़ाई-लिखाई के प्रति मोहभंग या उसे बोझ की तरह लेने का एक बड़ा कारण उनके कंधों पर जरूरत से ज्यादा भारी बस्ते का टंगा होना है।

कई सुझाव भी आते रहे हैं कि बस्ते का बोझ कम किया जाना चाहिए। सरकारों की तरफ से भी कई बार इस दिशा की ओर कदम उठाने की बात कही है, परंतु कदम नहीं उठाए।

अब सरकार ने कदम उठाए हैं तो इसका स्वागत ही है, परंतु इस तरह की पहल काफी पहले हो जानी चाहिए थी। निश्चित तौर पर बच्चे स्कूल से लौटने पर होमवर्क, फिर ट्यूशन पढ़ना और शाम को घर पर टीवी देखना क्योंकि खेलकूद के लिए बाहर मैदान कम ही रह गए हैं।

अब बच्चों पर पढ़ाई का मानसिक बोझ इतना बढ़ गया है कि वे पढ़ाई से उबने लगते हैं। यह बोझ और उबाऊपन उचित नहीं माना जा सकता है। अब नए दिशा-निर्देश सही है, परंतु इनका क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।

– कुशाग्र वालुस्कर

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