भोपाल गैस कांड : ऐसा घाव जो आज भी है हरा…

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भोपाल गैस कांड का नाम सुनकर ही आज भी कई लोगों कि रूह कांप जाती है| यह काली रात का एक ऐसा दर्द है, जिसकी दवाई आज तक नहीं मिल पाई है| 3 दिसंबर की वह मनहूस सुबह, जो अपने साथ एक ऐसी भयावह स्थिति लेकर आई, जिसका अंदाज़ा किसी को नहीं था| 2 दिसंबर की रात को सुनहरे कल के सपने संजोए कई लोग सोए होंगे, भोपाल में उस रात को भी शादी के कई मंडप सजे थे, लेकिन शायद भगवान को कुछ और ही मंजूर था, सभी के सपने और खुशियों पर पानी फेर गई उस काली रात की त्रासदी|

भोपाल गैस कांड के दर्द भरे 34 साल

भोपाल गैस कांड को तीन दशक से ज्यादा समय बीत चुका है, लेकिन आज भी उसकी यादें कई दिलों में ताज़ा हैं| आज भी लोग उस काली रात और मनहूस सुबह को कोसते हैं| 2-3 दिसंबर 1984 की रात कई लोगों को मौत की गहरी नींद सुला चुकी थी| 3 दिसंबर को सूरज तो निकला था, लेकिन कई मासूम हमेशा के लिए अंधियारे में जा चुके थे और जो जिंदा थे, उनका भविष्य अंधकारमय हो चुका था| आज 34 साल बाद भी पीड़ितों को राहत नहीं मिल पाई| जो भी हादसे में बच गए, वे असहनीय दर्द के कारण आज तक अपने आप को कोसते रहते हैं| दरअसल, आरिफ नगर में स्थित यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली गैस ने वहां काल का रूप ले लिया था| मौत की इस गैस के कारण लगभग  1,50,000 लोग विकलांग हो गए थे और 22,000 लोगों की मौत हो गई थी|

दर्दनाक भोपाल गैस कांड का इतिहास

किसी भी हादसे के हो जाने के बाद उसके पीछे दर्द और तकलीफ रह जाती है, लेकिन भोपाल गैस कांड एक ऐसा हादसा था, जो इतिहास की सबसे भीषण त्रासदियों में से एक बन गया|  इस तबाही का अंत यहीं नहीं हुआ, बल्कि आज तक इसका विनाशक असर पड़ रहा है| भोपाल गैस त्रासदी की इस घटना का नाम सुनते ही आज भी लोग सहम जाते हैं| गैस कांड के अगले दिन एक स्थानीय नेता लोगों का हुजूम लेकर ‘यूनियन कार्बाइड’ की तरफ बढ़े, उन्होंने लोगों को उनका हक़ दिलाने की भी बात की, लेकिन उसी दौरान एक अफवाह बहुत तेजी से फ़ैल गई कि यूनियन कार्बाइड कारखाने में आग लगा दी गई, जिससे गैस और फ़ैल रही है| इस अफवाह की आग के कारण भी कई लोगों को संकट का सामना करना पड़ा, इसके बाद तो राजनेताओं की  निकल पड़ी| सभी पार्टियां वहां अपनी-अपनी रोटियां सेंकने में जुट गई|

लोभ-लालच के कारण कई जानें

भोपाल गैस कांड के पीछे केवल लोभ था, लालच थी| वैसे तो कारखानों को रहवासी क्षेत्रों से दूर बनाया जाता है, लेकिन यूनियन कार्बाइड ने अपनी फैक्ट्री क़ाज़ी कैम्प के पास, जिसके आसपास कई लोग रहते थे, वहां 1969 में शुरू की थी| भारत में उस समय इंसानों की जान की कीमत शायद बहुत कम थी या जान से बढ़कर रुपया था इसलिए मौत की फैक्ट्री की शुरुआत में किसी ने आपत्ति नहीं उठाई| देश में रुपए-पैसे के बल पर सबकुछ पाना शायद आसान है| तब प्रशासन ऐसे उद्योगपतियों के कदमों में अपना सब कुछ न्यौछावर करने के लिए तत्पर था बशर्ते उनको मुंहमांगी कीमत मिल जाए| वर्ष 1969 में ‘यूनियन कार्बाइड कॉर्पोरेशन’ की शुरुआत हुई, जो एक कीटनाशक फैक्ट्री थी, जिसका 10 साल बाद 1979 में भोपाल में एक प्रोडक्शन प्लांट लगाया गया| इस प्लांट में जहरीला कीटनाशक तैयार किया जाता था|

नहीं मिला इंसाफ

भोपाल गैस कांड वाले दिन यदि थोड़ी सतर्कता रखी जाती तो शायद आज का दिन काला नहीं कहलाता| हादसे वाली काली रात के पहले दिन में गैस लीकेज की कई छोटी-छोटी घटनाएं हुई, लेकिन किसी का भी ध्यान उस ओर नहीं गया| इस मामले में यूनियन कार्बाइड फैक्टरी का मालिक वारेन एंडरसन दोषी था, जिसे भारत का कानून सज़ा नहीं दिला सका| दरअसल, हादसे के बाद एंडरसन को गिरफ्तार किया गया| सामान्यत: ऐसे आरोपों में आरोपी को जमानत नहीं दी जाती है, लेकिन गिरफ्तारी के महज कुछ घंटे बाद ही एंडरसन  को जमानत मिल गई| इतना ही नहीं वह विदेश भागने में भी कामयाब रहा|

29 सितंबर 2014 को दोषी ने अंतिम सांस ले ली, लेकिन भारत का कानून मासूमों को न्याय नहीं दिला पाया| हजारों लोग अपना हक़ न मिलने से दुखी हैं, उन्हें अफसोस इस बात का भी है कि तीन दशकों में कितनी सरकारें आईं, लेकिन कोई सरकार यह भी पता नहीं लगा पाई कि वारेन एंडरसन की रिहाई किसके कहने पर हुई थी| भोपाल में कंपनी बंद होने के बाद वहां मौजूद रासायनिक कचरा भी अब तक निपटाया नहीं जा सका है| वहीं आज भी कई लोग इस भयावह त्रासदी का दर्द झेल रहे हैं|

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