नेपाल के साथ कदम फूंक-फूंककर

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नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली की भारत-यात्रा ने दोनों देशों के संबंधों को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का भरोसा पैदा किया है, लेकिन उससे कोई ऐसा संकेत नहीं मिलता, जिससे यह आशा उत्पन्न हो कि ओली की चीनपरस्ती में कोई कमी आई है।

विदेश सचिव विजय गोखले ने साफ-साफ कहा है कि ओली से चीन के बारे में कोई बात नहीं हुई है जबकि ओली के भारत आने के पहले भारतीय अखबारों में यह खबर जमकर छपवाई गई कि भारत ओली से नाराज है, क्योंकि वे चीन की मदद से नेपाल में बड़े-बड़े बिजलीघर बनवा रहे हैं। भारत इन बिजलीघरों की बिजली बिल्कुल नहीं खरीदेगा। पता नहीं कि ओली से यह बात कहने की हिम्मत हमारी सरकार में रही या नहीं रही। यदि इसमें ही संदेह की गुंजाइश है तो हम यह आशा कैसे करें कि नेपाल से भारत चीनी महापथ (ओबोर) के बोर में खुलकर बात करेगा।

हां, यहां भारत ने चीन की नकल जरूर की। चीन ने नेपाल और तिब्बत के बीच रेल लाइन डालने की घोषणा की तो अब भारत ने भी दिल्ली से काठमांडू तक रेल बनाने का संकल्प जाहिर कर दिया। स्पष्ट है कि चीनी रेल हमारी रेल से पहले बनकर चलने लगेगी। हमारे अफसर बड़े चतुर-चालाक हैं। उन्होंने मोदी को अब एक नया जुमला सिखा दिया है। मोदी ने कहा कि नेपाल अब भूवेष्टित (जमीन से घिरा हुआ) नहीं, जमीन से जुड़ा हुआ राष्ट्र बन जाएगा। यही बात हमारी सरकार अफगानिस्तान पर लागू क्यों नहीं करती ? अटलजी के जमाने में वहां जरंज-दिलाराम सड़क तो बन गई लेकिन उस देश में रेल अभी तक नहीं चलती।

नेपाल और भारत के बीच गैस पाइप लाइन, सड़कें और बांध आदि बनाने पर अब भारत काफी खर्च करने को तैयार हो गया है, यह अच्छी बात है, लेकिन ओली ने गलती से भी यह नहीं कहा कि भारत के साथ नेपाल के अति विशिष्ट संबंध हैं। उनके बयान काफी सधे रहे। वे भारत और चीन को एक ही तराजू पर तौलते रहे बल्कि वे यह कहना भी नहीं भूले कि भारत ने 2015-16 नेपाल की जो घेराबंदी की थी, वह अवांछित थी। यह ठीक है कि ओली पहले चीन नहीं गए, भारत आए लेकिन यदि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ओली के जीतते ही काठमांडू नहीं जातीं और उन्हें नहीं पटातीं तो क्या वे पहले भारत आते ? वे पहले भारत आए तो सही, लेकिन उनकी इस यात्रा का संदेश यही है कि अब भारत को नेपाल के साथ बहुत सोच-समझकर व्यवहार करना होगा।

-डॉ. वेदप्रताप वैदिक

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार हैं)

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