कुत्तों की पॉटी का विशेष निष्पादन, क्यों?

0

क्या आपको पता है कि कुत्ते की एक ग्राम पॉटी में 2 करोड़ 30 लाख ‘कोलीफार्म’ बैक्टीरिया होते हैं । स्ट्रीट डॉग या पालतू कुत्तों की पॉटी खुली जगह, मैदान या सड़क पर पड़ी रहती है तो इसमें करोड़ों बैक्टीरिया और कुत्ते के पेट में पनप रहे कीड़ों के अंडे मिट्टी या घास में मिल जाते हैं । इनसे उत्पन्न “हेल्मिन्थ” कहे जाने वाले इन केंचुए राउंडवर्म, हुकवर्म आदि तरह-तरह के कीड़ों का इन्फेक्शन, धूप या पानी से नष्ट नहीं होता है। कुत्तों की पॉटी के सूखने के बाद भी इसके कीटाणुओं के अंडे या लारवा कई हफ्तों से लेकर कई सालों तक उस स्थान को प्रदूषित किए रहते हैं।

कुत्ते की पॉटी के कारण पैदा हुए इन कीटाणुओं के आपके पैर, जूते के तले या चप्पलों से लगने के बाद यह कीटाणु आपके घर में आ जाते हैं तो आपके घर के छोटे बच्चों के खेलने के साथ कीटाणु हाथ में लगकर उनके भोजन के साथ पेट में पहुंच जाते हैं । देखते ही देखते उनके पैर, हाथ में क्रेम्प आ जाते हैं, उन्हें दस्त लगने लगते हैं, पेट में तेज दर्द होने लगता है। आप उन्हें डॉक्टर के पास ले जाकर इलाज करवाते हैं । डॉक्टर उन्हें कीड़े मारने की दवा देते हैं। ये कीड़े मरकर लेट्रीन के साथ बाहर निकल आते हैं। कभी-कभी जब टेप वर्म का इन्फेक्शन हो तो बच्चों की पॉटी में मरे हुए ढेर सारे केंचुए बाहर निकल आते हैं । यदि समय रहते ‘डी वर्मिंग’ नहीं करवाया गया तो ये ही कीड़े किडनी खराब कर देते हैं। यदि ये रक्त में मिल गए, तब इन पेट के कीड़ों का अंडा मरीज के दिमाग में पहुंच जाता है तो मस्तिष्क के ‘ग्रे मेटेरियल‘ में यही कीड़े प्रजनन करके आदमी को कोमा में पहुंचाकर उसकी मौत का कारण बन सकते हैं ।

अमरीका के पर्यावरण सुरक्षा संस्थान (EPA,Environment Protection Agency) ने रिसर्च के बाद यह पाया है कि यदि 100 कुत्तों को किसी जगह तीन दिन तक पॉटी करने दिया जाए तो उनकी इस पॉटी से इतने बैक्टीरिया पैदा हो जाएंगे कि 20 वर्ग मील के पानी में मिलकर यही कीड़े आदमियों के पेट में जाकर गंभीर हालत पैदा कर देते हैं। अमरीका के उत्तरी वर्जीनिया में 1990 में 11400 कुत्तों पर नजर रखी गई । पाया गया कि ये कुत्ते एक दिन में करीबन पांच हजार पौण्ड पॉटी कर रहे हैं। इनके कारण जहां इनकी ‘पॉटी’ को दफनाया गया, उस स्थान के ‘चार वर्ग मील‘ के इलाके का भूमिगत जल दूषित हो गया । वहां के पानी में ऑक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता बहुत कम हो गई । इस पूरे इलाके में पांच सौ अलग-अलग किस्म के ‘फिकल कोलीफोर्म‘ पाए गए ।

कुत्तों की पॉटी का जब विश्लेषण किया गया तो प्रमुख रूप से निम्न बैक्टीरिया, कीटाणु या कहिये कि अलग-अलग किस्म के पेट में पड़ने वाले कीड़ों को पैदा करने वाले अंडे पाए गए, जो प्रमुख हैं|

Whipworm,hookworm,roundworm,tapworm,pavo,corona,giardiasis,

salmonellosis,cryptosporidiosis और campylobacteriosis

अमरीका के सेन्टर फॉर डिसीज कन्ट्रोल के अनुसार, इन कीटाणुओं से होने वाली बीमारियों को ‘ZOONOSES’ कहा जाता है। भारत में इन बीमारियों को ‘एसटीएच’ यानि ‘सोयल ट्रान्समिटेड हेलमिन्थ्स’ की बीमारियां कहा जाता है । विश्व स्वास्थ्य संघ (डब्ल्यूएचओ)  के एक अध्ययन के अनुसार, पूरी दुनिया में लगभग दो अरब लोग ‘एसटीएच’ बीमारी के शिकार हैं। डब्ल्यूएचओ के अनुसार, एक साल में पूरी दुनिया में 87 करोड़ बच्चे पेट में कीड़ों की बीमारी के शिकार हो रहे हैं । इन बीमार बच्चों में पच्चीस प्रतिशत बच्चे सिर्फ भारत के हैं ।

इस संबंध में बीएमसी, पब्लिक हेल्थ नामक रिसर्च पत्रिका अंक 17, पृष्ट 201, वर्ष 2017 के रिसर्च पेपर के निष्कर्षों पर नजर डालें तो यह सिद्ध हो जाता है कि भारत में बच्चों के पेट में कीड़े पड़ने की बीमारी के लिए यदि कोई दोषी है तो वे हैं स्ट्रीट डॉग यानि सड़कों पर आवारा घूमने वाले कुत्तों की पॉटी और जो लोग अपने घरों में कुत्ते पालते हैं और सुबह शाम अपने कुत्तों को या तो खुला छोड़ देते हैं या सुनसान जगह  सड़क किनारे जाकर पॉटी करवाते हैं।

स्मार्ट सिटी बन रहे हमारे नगर इन्दौर को पूरे भारत में सफाई में नंबर एक होने के बाद भी हम कुत्तों से मुक्त नहीं करवा सकते हैं। इनमें सबसे बड़ा रोड़ा है मेनका गांधी और शासन का एनिमल क्रुयेल्टी प्रिवेन्शन एक्ट । इस कारण नगर निगम के लोग कुत्तों को पकड़कर नसबन्दी करके जहां से पकड़ा है, वहीं छोड़ जाते हैं। कुत्ते कहां पॉटी करते हैं सब जानते हैं, इसी तरह पालतू कुत्तों के मालिक सड़क किनारे सार्वजनिक स्थानों पर पॉटी करवाते हैं । यह उन्हें इसलिये भी करना पड़ता है क्योंकि कुत्तों के ‘पू’ निष्पादन की कोई व्यवस्था कहीं नहीं है।

पश्चिम के देशों में सड़क किनारे, बाग-बगीचों और सार्वजनिक स्थानों पर पालतू कुत्तों की पॉटी कलेक्शन के लिए जगह-जगह व्यवस्था की गई है । इस पॉटी को नियमित एकत्र कर प्रोसेस करके निष्पादन किया जाता है । इस कारण भूमिगत जल जहरीला नहीं होता है और यही कारण है कि अमरीका जैसे देश में अब टेप वर्म, हुक वर्म,राउंड वर्म जैसी बच्चों के लिए दुखदायी बीमारियों का लगभग अंत हो गया है ।

भारत के प्रधानमंत्री को अब ‘स्वच्छ भारत अभियान’ में कुत्तों की पॉटी के पूरी तरह निष्पादन को भी जोड़ लेना चाहिए। इससे देश के करोड़ों बच्चों का रात के समय ‘सोते में दांत किटकिटाना’ बंद हो जाएगा ।

-डॉ.राम श्रीवास्तव

(लेखक वैज्ञानिक और समीक्षक हैं)

Share.