राजनीति के उभरते सितारे केसीआर…

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तीन राज्यों में कांग्रेस को नया जीवनदान मिला है। वहीं तेलंगाना में कांग्रेस सत्ता पाने में असफल रही। तेलंगाना में नायडू के नेतृत्व वाली तेलुगुदेशम पार्टी की सीटें 15 से घटकर मात्र 2 पर आ गईं, जिसका सीधा असर लोकसभा चुनाव में देखने को मिलेगा। अब नायडू की पहली प्राथमिकता सत्ता में लौटने की होगी। तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति के सुप्रीमो के.चंद्रशेखर राव( K. Chandrashekar Rao Political Jounery), जिन्हें सामान्यत: केसीआर कहा जाता है, वे काफी वक्त से गैर कांग्रेसी और गैर भाजपा राजनीतिक दलों का एक फेडरल फ्रंट बनाने में लगे थे।

केसीआर ने 6 महीने पहले विधानसभा को भंग करवाकर एक बड़ा दांव खेला था, जिसमें वे पूरी तरह सफल रहे। वहीं उनका दल भी शक्तिशाली बनकर उभरा है। राजनीतिक विश्लेषकों ने तेलंगाना चुनाव परिणामों को केसीआर की सुनामी कहा है। पार्टी ने कुल 119 सीटों में से 88 सीटें जीतीं। उनकी पार्टी को कुल वोटों के लगभग 74 प्रतिशत मत मिले। महागठबंधन में कांग्रेस ने बड़े दल के रूप में 95 सीटों पर चुनाव लड़ा, परंतु 19 सीटों से ही संतुष्ट होना पड़ा। इधर, तेलुगुदेशम की हालत भी पतली हो गई। एक वक्त तेलंगाना राष्ट्र समिति भाजपा के साथ थी, लेकिन बाद में इससे दूर हो गई। भाजपा के खाते में भी बस 1 सीट आई जबकि पिछली विधानसभा में उसके पास 5 सीटें थीं।

राज्य में लगभग 80 प्रतिशत मतदान हुआ था और यह कहा गया कि सरकार से नाखुश लोगों ने आगे बढ़कर वोट दिया, जिसका पूरा फायदा कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन को होना था, पर ऐसा नहीं हुआ। जनता ने सरकार की चाबी तेलंगाना राष्ट्र समिति को सौंप दी। राव को अपनी जीत पर पूरा भरोसा था। सितंबर में विधानसभा भंग होने के अगले दिन ही उन्होंने अपनी पार्टी के 105 प्रत्याशी घोषित कर दिए थे। राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि कांग्रेस ने तेलगुदेशम पार्टी के साथ महागठबंधन करके गलती कर दी। नायडू और उनकी पार्टी ने आंध्रप्रदेश से अलग होकर बनने वाले तेलंगाना का विरोध किया था इसलिए उनकी पार्टी को इसका परिणाम भुगतना पड़ा।

राज्य में मुसलमानों की आबादी कांग्रेस के साथ रही है। ओवैसी की एआईएमआईएम का प्रभाव राजधानी हैदराबाद तक ही सीमित है। केसीआर ने उनकी पार्टी से समझौता कर लिया। ओवैसी की पार्टी भले ही छोटी हो, लेकिन वे राज्य के एक बड़े नेता हैं। ओवैसी की पार्टी 7 सीट जीतने में सफल रही। कांग्रेस ने मुस्लिम वोटों से जीतने का प्रयत्न किया था। पार्टी ने चुनाव से पहले पूर्व भारतीय क्रिकेट कप्तान अजहरूद्दीन को प्रदेश कांग्रेस समिति का कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाया, पर इसका कोई लाभ नहीं मिला।

केसीआर ने अपने पिछले कार्यकाल में जो योजनाएं शुरू की, उनमें सर्वाधिक चर्चा रयतु बंधु योजना थी। यह योजना किसानों के लिए थी। इस योजना से किसानों को लाभ मिला इसलिए उन्होंने तेलंगाना राष्ट्र समिति के उम्मीदवारों को भारी संख्या में मत दिए। इस योजना के क्रियान्वयन में किसी प्रकार की अनियमितता या किसी प्रकार का भ्रष्टाचार नहीं हुआ। किसानों को इसका सीधा लाभ मिला।

केसीआर का दावा है कि उनकी सरकार की यह योजना ऐसी योजना है, जो किसानों की आर्थिक समस्या का हल है। इसे यदि राष्ट्रीय स्तर पर लागू किया जाता है तो इस पर कुल मिलाकर 3.5 लाख करोड़ का सालाना खर्च आएगा।

अब केसीआर का पूरा इरादा फेडरल फ्रंट बनाने पर है। उनका इरादा होगा कि लोकसभा चुनाव से पहले फेडरल फ्रंट बनकर सामने आ जाए। फेडरल फ्रंट में ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, नीतीश कुमार को शामिल कर सकते हैं। केसीआर चंद्रबाबू नायडू को पीछे धकेलकर राष्ट्रीय राजनीति में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे हैं। देखा जाए तो केसीआर दक्षिण के नए सितारे बनकर उभर रहे हैं।

 

– कुशाग्र वालुस्कर

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