International Minorities Rights Day : अधिकारों की रक्षा

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हर कोई राष्ट्र की बात करता है, राष्ट्रीय एकता का राग अलापता है, लेकिन पृथकतावाद और अल्पसंख्यकवाद का पोषण करता है| इस दोगली नीति के कारण ही कुछ समुदायों का समाज में हनन होता गया| इससे अल्पसंख्यकवाद और बहुसंख्यकवाद बढ़ता गया| आज विश्वभर में अल्पसंख्यक अधिकार दिवस मनाया जा रहा है| क्या आप जानते हैं कि आज का दिन क्यों मनाया जाता है? कब से इसकी शुरुआत हुई और इसकी आवश्यकता क्यों महसूस की गई| भाषा, जाति, धर्म, संस्कृति, परंपरा आदि में भिन्नता के आधार पर कुछ समुदायों को चिन्हित किया गया, जिन्हें अल्पसंख्यकों की श्रेणी में रखा गया| आज का दिन अल्पसंख्यकों के अधिकारों का हनन होने से बचाने के उद्देश्य से मनाया जाता है|

कौन हैं अल्पसंख्यक? किस आधार किया जाता है चिन्हित

किसी देश में रहने वाले ऐसे समुदाय को अल्पसंख्यकों की श्रेणी में रखा जाता है, जो संख्या में कम हो और आर्थिक या सामाजिक रूप से कमजोर हों| आजकल देश में कई समुदायों द्वारा खुद को अल्पसंख्यकों में शामिल  किए जाने के लिए जंग छिड़ी है| आए दिन ऐसे कई प्रदर्शन किए जाते हैं, जिनमें अल्पसंख्यकों में शामिल किए जाने की मांग उठती है|

अल्पसंख्यक ऐसे लोग होते हैं, जो बहुसंख्यकों से अलग होते हुए भी राष्ट्र के निर्माण, विकास, एकता, संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय भाषा को बनाए रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| ऐसे लोगों के अधिकारों को सुरक्षित रखने और उन्हें बहुसंख्यक समाज की प्रताड़ना से बचाने के लिए सरकार ने आज के दिन की शुरुआत की|

18 दिसंबर 1992 को संयुक्त राष्ट्र ने ‘अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस’ की शुरुआत की थी| तब से लेकर आज तक प्रतिवर्ष आज यानी 18 दिसंबर के दिन ‘अंतरराष्ट्रीय अल्पसंख्यक अधिकार दिवस’ मनाया जाता है| भारत में अल्पसंख्यकों के विकास और संवृद्धि के लिए अल्पसंख्यक मंत्रालय का भी निर्माण किया गया है, जो केवल विशेष समुदाय के अधिकारों के लिए कार्य करता है|

अल्पसंख्यकों को संविधान द्वारा दिए गए अधिकार – आर्थिक सशक्तिकरण का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, समान अवसर मिलने का अधिकार, महिला सशक्तिकरण, कानून के तहत सुरक्षा और संरक्षण का अधिकार, संवैधानिक अधिकार और समानता का अधिकार|

अल्पसंख्यकों में शामिल

भारत के संविधान में अल्पसंख्यक होने का आधार धर्म और भाषा को माना गया| इसमें भारत की कुल आबादी का 19 प्रतिशत भाग शामिल है| भारत में अल्पसंख्यकों में मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी शामिल हैं| वहीं  जैन, बहाई और यहूदी समाज को भी अल्पसंख्यक माना गया है, लेकिन इन्हें संबंधित संवैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है| 1891 में जब भारत के जनगणना आयुक्त से हिन्दू की परिभाषा पूछी गई थी, तब उन्होंने कहा था कि देश में यदि हम ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, निचली जातियां, पहाड़ी व जनजातियों आदि को निकालकर जो बचता है, उसे हिन्दू कह सकते हैं| अब तो वह सीमा भी सिकुड़ गई है|

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