जानिये सियाचिन में कैसे करते है हमारे देश के जवान संघर्ष

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हमारे देश के सैनिकों के बारे में आप जितना जानते है वो इससे भी कही ज्यादा संघर्ष करते है सीमा पर हमारे मातृभूमि की रक्षा के लिए हमें थोड़ी भी गर्मी या ठंड (Siachin Glacier) लगती है तो हम बेचैन हो जाते है और अपने आपको अपने आराम के हिसाब से ढाल लेते है क्योंकि हमारे पास पर्याप्त संसाधन लेकिन हमारे देश के जवान हमसे ज्यादा बहुत ज्यादा विकट परिस्थितियों में रहते है. उनके पास ना खाने लायक भोजन होता न रहने योग्य वातावरण होता है और उसके बाद हर वक्त दुश्मनों से गोली का खतरा लेकिन उसके बाद भी जान हथेली में लिए हमारे जवान मातृभूमि की रक्षा के लिए सीमा पर सीना ताने खड़े रहते है।

Siachen Glacier

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इन दिनों सोशल मीडिया पर हमारे जवानो का एक वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है जिसमे वो बता रहे है उनको भोजन के लिए ग्लेसियर (Siachin Glacier) में कितना संघर्ष करना पड़ता है। जहा पर  लगभग -50 से -60 डिग्री तक तापमान होता है इस वीडियो में तीन जावन दिख रहे है जिनमे से एक हाथ में हैमर है और काटने वाला चाक़ू है उनके सामने एक मेज रखी हुई है जिसमे खाने की कुछ सब्जियां अंडे और जूस रखा हुआ है। जवान इस जूस का पैकेट खोलते है तो ये जूस जमकर पत्थर की तरह सख्त हो गया है। जो हैमर से तोड़ने पर भी नहीं टूट रहा है अंडे जो से पटकने पर भी नहीं टूट रहे है। आलू काटने से भी नहीं कट रहे है इतने सख्त हो गए है।  इस तरह टमाटर अदरक प्याज  सभी है अब इससे अंदाजा लगाया जा सकता है ग्लेसियर में कैसे जीवन से लड़ते हुए दुश्मन से लड़ते है हमारे जवान उसके बाद भी इनका सीना हमेशा  तना रहता है चेहरे पर कोई गम नहीं होता हमेशा और अपनी भारत माता को सब कुछ मान कर हर संघर्ष में मुस्कुराते रहते है।

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Siachen Glacier

Siachin Glacier Is Very Tough Place For Army | Daily News कुछ इसी तरह सैनिक अपनी जिंदगी जीते है सियाचिन में, आपको बता दें की सियाचिन ग्लेशियर (Siachin Glacier) को पूरी दुनिया में सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित युद्ध स्थल के रूप में जाना जाता है. सियाचिन ग्लेशियर; पूर्वी कराकोरम / हिमालय, में स्थित है. इसकी स्थिति भारत-पाक नियंत्रण रेखा के पास  स्थित है. सियाचिन ग्लेशियर का क्षेत्रफल लगभग 78 किमी है. सियाचिन, काराकोरम के पांच बड़े ग्लेशियरों में सबसे बड़ा और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा ग्लेशियर है  यहाँ पर बेस कैंप से भारत की जो चौकी सबसे दूर है उसका नाम इंद्रा कॉल है और सैनिकों को वहाँ तक पैदल जाने में लगभग 20 से 22 दिन का समय लग जाता है. चौकियों पर जाने वाले सैनिक एक के पीछे एक लाइन में चलते हैं और एक रस्सी सबकी क़मर में बँधी होती है. क़मर में रस्सी इसलिए बाँधी जाती है क्योंकि बर्फ़ कहाँ धँस जाए इसका पता नहीं रहता और अगर कोई एक व्यक्ति खाई में गिरने लगे तो बाकी लोग उसे बचा सकें. ऑक्सीजन की क़मी होने की वजह से उन्हें धीमे-धीमे चलना पड़ता है और रास्ता कई हिस्सों में बँटा होता है. साथ ही ये भी तय होता है कि एक निश्चित स्थान पर उन्हें किस समय तक पहुँच जाना है और फिर वहाँ कुछ समय रुककर आगे बढ़ जाना है. हज़ारों फ़ुट ऊँचे पहाड़ या हज़ारों फ़ुट गहरी खाइयाँ, न पेड़-पौधे, न जानवर, न पक्षी. इतनी बर्फ़ कि अगर दिन में सूरज चमके और उसकी चमक बर्फ़ पर पड़ने के बाद आँखों में जाए तो आँखों की रोशनी जाने का ख़तरा और अगर तेज़ चलती हवाओं के बीच रात में बाहर हों तो चेहरे पर हज़ारों सुइयों की तरह चुभते, हवा में मिलकर उड़ रहे बर्फ़ के अंश.

Siachen Glacier

Siachin Glacier Is Very Tough Place For Army | Daily News इन हालातों में सैनिक कपड़ों की कई तह पहनते हैं और सबसे ऊपर जो कोट पहनते हैं उसे “स्नो कोट” कहते हैं. इस तरह उन मुश्किल हालात में कपड़ों का भी भार सैनिकों (Siachin Glacier) को उठाना पड़ना है. आपको बता दें की यहाँ सैनिक लकड़ी की चौकियों पर स्लीपिंग बैग में सोते हैं, मगर ख़तरा सोते समय भी मँडराता रहता है क्योंकि ऑक्सीजन की कमी की वजह से कभी-कभी सैनिकों की सोते समय ही जान चली जाती है. इस स्थिति से बचाने के लिए वहाँ खड़ा संतरी उन लोगों को बीच-बीच में उठाता रहता है और वे सभी सुबह छह बजे उठ जाते हैं. वैसे उस ऊँचाई पर ठीक से नींद भी नहीं आती. सियाचिन में नहाने के बारे में सोचा नहीं जा सकता और सैनिकों को दाढ़ी बनाने के लिए भी मना किया जाता है क्योंकि वहाँ त्वचा इतनी नाज़ुक़ हो जाती है कि उसके कटने का ख़तरा काफी बढ़ जाता है और अगर एक बार त्वचा कट जाए तो वो घाव भरने में काफ़ी समय लगता है. ऐसे  ही माहौल में भारतीय सेना ने पिछले 10 साल में अपने 163 जवान खो दिए हैं. तो ऐसा है हमारे जवानो का संघर्ष जिनके कारण हम सुकून से घर में सोते है।

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-Mradul tripathi

 

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