भगतसिंह फांसी से नहीं बल्कि गोली से मरना चाहते थे, जानिए कारण

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भारत को स्वतंत्र करवाने में कई वीर सपूतों ने अपना बलिदान दिया, उन्हीं में से एक हैं भगतसिंह, जो युवाओं के प्रेरणास्त्रोत हैं| क्रांतिकारी  शहीद-ए-आजम भगतसिंह की आज 111वीं जयंती है| ये एक ऐसे नायक हैं, जिन पर सबसे अधिक फिल्में भी बनाई गईं| आजादी की लड़ाई का कठोर संघर्ष, शादी नहीं करने के लिए घर से भाग जाना और अंत में अंग्रेजों द्वारा फांसी पर लटका देना, उनके जीवन की इन घटनाओं को फिल्मों में दिखाया जा चुका है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगतसिंह फांसी पर नहीं लटकना चाहते थे? वे अपने सीने पर गोली खाकर वीरगति प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन उनकी अंतिम इच्छा पूरी नहीं हुई|

भगतसिंह का जन्म जिला लायलपुर, जो अब पाकिस्तान में है, के बावली नामक गांव में 28 सितंबर 1907 को हुआ था| एक सामान्य परिवार में जन्मे वीर के मन में देशभक्ति कूट-कूटकर भरी थी| अमृतसर में 13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड से उनके मन को गहरा सदमा लगा| इसके बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की| इसके बाद  जब काकोरी कांड में रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ सहित कई क्रांतिकारियों को फांसी पर लटका दिया गया, तब वे बहुत ज्यादा दुखी हुए| वे इसके बाद चन्द्रशेखर आज़ाद की पार्टी ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ से जुड़ गए|

आज़ादी पाने के लिए हमें मांगने की जगह रण करना होगा  

भगतसिंह हमेशा कहा करते थे कि अंग्रेजों से आज़ादी पाने के लिए हमें मांगने की जगह रण करना होगा|  स्‍कूली शिक्षा के दौरान ही उन्‍होंने यूरोप के विभिन्‍न देशों में हुई क्रांतियों का अध्‍ययन किया| वे तब से ही गुलामी की जंजीरों में जकड़े भारत की आज़ादी के सपने देखने लगे|

शादी नहीं करने के लिए भागे

भगतसिंह के परिजन ने जब उनकी शादी करनी चाही तो उन्होंने कहा कि यदि वे परतंत्र भारत में शादी करेंगे तो उनकी दुल्हन केवल मौत होगी| इसके बाद  वे घर छोड़कर कानपुर भाग गए| घर से जाने से पहले उन्होंने एक ख़त भी लिखा| ख़त में लिखा कि उन्होंने अपना जीवन देश को आज़ाद करवाने के महान काम के लिए समर्पित कर दिया है, अब वे किसी और चीज के कारण अपना मन नहीं भटकाना चाहते हैं|

जेल प्रवास

जेल प्रवास के दौरान भगतसिंह ने विदेशी और देशी कैदियों के बीच जेल में होने वाले भेदभाव के खिलाफ भूख हड़ताल की|

इसलिए मिली थी फांसी

भगतसिंह ने  सुखदेव और राजगुरु के साथ मिलकर एक ब्रिटिश जूनियर पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी थी| इस केस में तीनों को गिरफ्तार किया गया| इस मुकदमे के लिए एक विशेष ट्राइब्यूनल का गठन किया गया| ट्राइब्यूनल ने फांसी देने का फैसला सुनाया| 24 मार्च 1931 को फांसी देने की तारीख नियत हुई, लेकिन पूरे देश में प्रदर्शन हो रहे थे और लाहौर में भीड़ जुटने लगी थी| प्रदर्शन देखकर नियत तारीख से 11 घंटे पहले ही 23 मार्च 1931 को उनको शाम साढ़े सात बजे फांसी दे दी गई|

गोली खाकर मरना चाहते थे

भगतसिंह नहीं चाहते थे कि उन्हें फांसी पर लटकाया जाए| वे चाहते थे कि उनके सीने पर गोली मारी जाए| इसके लिए उन्होंने अंग्रेजों से काफी निवेदन भी किया, लेकिन अंग्रेजों ने उनकी बात नहीं मानी|

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