आरक्षण का आधार आर्थिक हो

1

आरक्षण एक ऐसा ज्वलंत मुद्दा है, जो आज़ादी के बाद से ही भारत में प्रासंगिक रहा है| सदियों से दबे-कुचले और उपेक्षित वर्ग को उनका अधिकार मिल सके, इसके लिए सन 1882 में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में हंटर कमीशन का गठन हुआ। सबसे पहले महात्मा ज्योतिराव फुले ने वंचित तबके के लिए मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा की वकालत करते हुए सरकारी नौकरियों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग की थी।

1901-02 में कोल्हापुर रियासत के छत्रपति शाहूजी महाराज ने वंचित तबके के लिए आरक्षण व्यवस्था शुरू की। कोल्हापुर रियासत की अधिसूचना में पिछड़े और वंचित समुदाय के लिए नौकरियों में 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित की गई। देश में वंचित तबके के लिए आरक्षण देने संबंधी आधिकारिक रूप से वह पहला राजकीय आदेश माना जाता है।

आज़ादी मिलने के बाद संविधान निर्माण के समय शोषित वर्गों की स्थिति अन्य वर्गों के समान करने और उनके जीवन स्तर को ऊपर उठाने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई थी और स्पष्ट रूप से इसका समय 25 वर्ष तय किया गया था| इस अवधि के पूर्ण होने के बाद भी सत्तालोलुप राजनीतिक दल यह व्यवस्था संचालित करते रहे ताकि वे सरकार में बने रहें| इस कार्य में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह अव्वल रहे| कहा जाए तो आज आरक्षण के कारण सवर्णों की जो स्थिति है, इसके लिए वे ही जिम्मेदार हैं|

दरअसल, 1979 में स्थापित मंडल आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की, जिसमें पिछड़ी जातियों को दिए जाने वाले आरक्षण को ख़त्म करने के बजाय इस कोटे की सीमा 22% से 49.5% वृद्धि करने की सिफारिश की गई| सत्ता के लोभ में प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करवाया| उस समय छात्र संगठनों ने राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू किया। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने इसका विरोध करते हुए आत्मदाह की कोशिश की और कई छात्रों ने उनका अनुसरण किया। इसके बाद राजनेता चुनाव जीतने के लिए एससी-एसटी और अन्य पिछड़े वर्गों को सुविधाएं प्रदान करते गए| सवर्ण वर्ग आज भी आरक्षण का बोझ उठाने को मजबूर हैं|

स्थिति यह है कि काबिलियत और योग्यता होने के बावजूद सवर्ण वर्ग को अवसर नहीं मिल पाता है वहीं कम प्रतिशत और काबिलियत में कमी के बावजूद आरक्षित वर्ग के लोग उच्च पदों पर आसीन हो जाते हैं| आरक्षण की व्यवस्था उन गरीब तबके के लोगों के लिए की गई थी जो योग्य हैं, परंतु आर्थिक तंगी के कारण आगे पढ़ नहीं पाते हैं| इसके लिए उन्हें फीस में और प्रतिशत में छूट दी गई, ताकि वे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित हो सकें, परंतु वर्तमान में यह देखने में आ रहा है कि आरक्षित वर्ग के कई धनाढ्य और सक्षम लोग भी आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं| वहीं सवर्ण वर्ग के कई लोग गरीब लोग इस लाभ से वंचित हैं| सवाल यह है कि क्या तथाकथित ऊंची जातियों में गरीब और शोषित लोग नहीं हैं|

मेरा मानना है कि आरक्षण का आधार जातिगत होने के बजाय आर्थिक होना चाहिए| ऐसे लोग जो गरीब होने के कारण उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं, उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए चाहे वह किसी भी जाति का हो| इससे सभी वर्गों के गरीबों को लाभ मिलेगा और सक्षम होने के बावजूद आरक्षण का लाभ उठाने वालों से मुक्ति मिलेगी|

क्रमशः

– अंकुर उपाध्याय

Share.